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title: "बालकाण्ड दोहा 202"
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# बालकाण्ड · दोहा 202

**चौ०** 
> अगनित रबि ससि सिव चतुरानन। बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन॥  
> काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ। सोउ देखा जो सुना न काऊ॥१॥

भावार्थ: अगणित सूर्य, चन्द्रमा, शिव, ब्रह्मा, बहुत-से पर्वत, नदियाँ, समुद्र, पृथ्वी, वन, काल, कर्म, गुण, ज्ञान और स्वभाव देखे। और वे पदार्थ भी देखे जो कभी सुने भी न थे॥१॥

**चौ०** 
> देखी माया सब बिधि गाढ़ी। अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी॥  
> देखा जीव नचावइ जाही। देखी भगति जो छोरइ ताही॥२॥

भावार्थ: सब प्रकारसे बलवती मायाको देखा कि वह [भगवान्‌के सामने] अत्यन्त भयभीत हाथ जोड़े खड़ी है। जीवको देखा, जिसे वह माया नचाती है और [ फिर ] भक्तिको देखा, जो उस जीवको [ मायासे ] छुड़ा देती है॥२॥

**चौ०** 
> तन पुलकित मुख बचन न आवा। नयन मूदि चरननि सिरु नावा॥  
> बिसमयवंत देखि महतारी। भए बहुरि सिसुरूप खरारी॥३॥

भावार्थ: [ माताका ] शरीर पुलकित हो गया, मुखसे वचन नहीं निकलता। तब आँखें मूँदकर उसने श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सिर नवाया। माताको आश्चर्यचकित देखकर खरके शत्रु श्रीरामजी फिर बालरूप हो गये॥३॥

**चौ०** 
> अस्तुति करि न जाइ भय माना। जगत पिता मैं सुत करि जाना॥  
> हरि जननी बहुबिधि समुझाई। यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई॥४॥

भावार्थ: [ मातासे ] स्तुति भी नहीं की जाती। वह डर गयी कि मैंने जगत्पिता परमात्माको पुत्र करके जाना। श्रीहरिने माताको बहुत प्रकारसे समझाया [ और कहा— ] हे माता! सुनो, यह बात कहींपर कहना नहीं॥४॥

**दो०** 
> बार बार कौसल्या बिनय करइ कर जोरि।  
> अब जनि कबहूँ ब्यापै प्रभु मोहि माया तोरि॥२०२॥

भावार्थ: कौसल्याजी बार-बार हाथ जोड़कर विनय करती हैं कि हे प्रभो! मुझे आपकी माया अब कभी न व्यापे॥२०२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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