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title: "बालकाण्ड दोहा 20"
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# बालकाण्ड · दोहा 20

**चौ०** 
> आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ॥  
> सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू॥१॥

भावार्थ: दोनों अक्षर मधुर और मनोहर हैं, जो वर्णमालारूपी शरीरके नेत्र हैं, भक्तोंके जीवन हैं तथा स्मरण करनेमें सबके लिये सुलभ और सुख देनेवाले हैं, और जो इस लोकमें लाभ और परलोकमें निर्वाह करते हैं ( अर्थात्‌ भगवान्‌के दिव्य धाममें दिव्य देहसे सदा भगवत्सेवामें नियुक्त रखते हैं )॥१॥

**चौ०** 
> कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके। राम लखन सम प्रिय तुलसी के॥  
> बरनत बरन प्रीति बिलगाती। ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती॥२॥

भावार्थ: ये कहने, सुनने और स्मरण करनेमें बहुत ही अच्छे ( सुन्दर और मधुर ) हैं; तुलसीदासको तो श्रीराम-लक्ष्मणके समान प्यारे हैं। इनका ( ‘र’ और ‘म’ का ) अलग-अलग वर्णन करनेमें प्रीति बिलगाती है ( अर्थात्‌ बीजमन्त्रकी दृष्टिसे इनके उच्चारण, अर्थ और फलमें भिन्नता दीख पड़ती है ) परन्तु हैं ये जीव और ब्रह्मके समान स्वभावसे ही साथ रहनेवाले ( सदा एकरूप और एकरस )॥२॥

**चौ०** 
> नर नारायन सरिस सुभ्राता। जग पालक बिसेषि जन त्राता॥  
> भगति सुतिय कल करन बिभूषन। जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन॥३॥

भावार्थ: ये दोनों अक्षर नर-नारायणके समान सुन्दर भाई हैं, ये जगत्‌का पालन और विशेषरूपसे भक्तोंकी रक्षा करनेवाले हैं। ये भक्तिरूपिणी सुन्दर स्त्रीके कानोंके सुन्दर आभूषण ( कर्णफूल ) हैं और जगत्‌के हितके लिये निर्मल चन्द्रमा और सूर्य हैं॥३॥

**चौ०** 
> स्वाद तोष सम सुगति सुधा के। कमठ सेष सम धर बसुधा के॥  
> जन मन मंजु कंज मधुकर से। जीह जसोमति हरि हलधर से॥४॥

भावार्थ: ये सुन्दर गति ( मोक्ष ) रूपी अमृतके स्वाद और तृप्तिके समान हैं, कच्छप और शेषजीके समान पृथ्वीके धारण करनेवाले हैं, भक्तोंके मनरूपी सुन्दर कमलमें विहार करनेवाले भौंरेके समान हैं और जीभरूपी यशोदाजीके लिये श्रीकृष्ण और बलरामजीके समान ( आनन्द देनेवाले ) हैं॥४॥

**दो०** 
> एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ।  
> तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ॥२०॥

भावार्थ: तुलसीदासजी कहते हैं—श्रीरघुनाथजीके नामके दोनों अक्षर बड़ी शोभा देते हैं, जिनमेंसे एक ( रकार ) छत्ररूप ( रेफ र्‌ )से और दूसरा ( मकार ) मुकुटमणि ( अनुस्वार ं ) रूपसे सब अक्षरोंके ऊपर हैं॥२०॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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