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title: "बालकाण्ड दोहा 2"
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# बालकाण्ड · दोहा 2

ब्राह्मण-संत-वन्दना

**चौ०** 
> गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन॥  
> तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनउँ राम चरित भव मोचन॥ १ ॥

भावार्थ: श्रीगुरु महाराजके चरणोंकी रज कोमल और सुन्दर नयनामृत-अञ्जन है, जो नेत्रोंके दोषोंका नाश करनेवाला है। उस अञ्जनसे विवेकरूपी नेत्रोंको निर्मल करके मैं संसाररूपी बन्धनसे छुड़ानेवाले श्रीरामचरित्रका वर्णन करता हूँ॥१॥

**चौ०** 
> बंदउँ प्रथम महीसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना॥  
> सुजन समाज सकल गुन खानी। करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी॥ २ ॥

भावार्थ: पहले पृथ्वीके देवता ब्राह्मणोंके चरणोंकी वन्दना करता हूँ, जो अज्ञानसे उत्पन्न सब संदेहोंको हरनेवाले हैं। फिर सब गुणोंकी खान संत-समाजको प्रेमसहित सुन्दर वाणीसे प्रणाम करता हूँ॥२॥

**चौ०** 
> साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू॥  
> जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा॥३॥

भावार्थ: संतोंका चरित्र कपासके चरित्र ( जीवन )-के समान शुभ है, जिसका फल नीरस, विशद और गुणमय होता है। ( कपासकी डोडी नीरस होती है, संत-चरित्रमें भी विषयासक्ति नहीं है, इससे वह भी नीरस है; कपास उज्ज्वल होता है, संतका हृदय भी अज्ञान और पापरूपी अन्धकारसे रहित होता है, इसलिये वह विशद है, और कपासमें गुण ( तन्तु ) होते हैं, इसी प्रकार संतका चरित्र भी सद्‌गुणोंका भण्डार होता है, इसलिये वह गुणमय है। ) [ जैसे कपासका धागा सूईके किये हुए छेदको अपना तन देकर ढक देता है, अथवा कपास जैसे लोढ़े जाने, काते जाने और बुने जानेका कष्ट सहकर भी वस्त्रके रूपमें परिणत होकर दूसरोंके गोपनीय स्थानोंको ढकता है उसी प्रकार ] संत स्वयं दुःख सहकर दूसरोंके छिद्रों ( दोषों )-को ढकता है, जिसके कारण उसने जगत्‌में वन्दनीय यश प्राप्त किया है॥३॥

**चौ०** 
> मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू॥  
> राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा॥४॥

भावार्थ: संतोंका समाज आनन्द और कल्याणमय है, जो जगत्‌में चलता-फिरता तीर्थराज ( प्रयाग ) है। जहाँ ( उस संतसमाजरूपी प्रयागराजमें ) रामभक्तिरूपी गङ्गाजीकी धारा है और ब्रह्मविचारका प्रचार सरस्वतीजी हैं॥४॥

**चौ०** 
> बिधि निषेधमय कलिमल हरनी। करम कथा रबिनंदनि बरनी॥  
> हरि हर कथा बिराजति बेनी। सुनत सकल मुद मंगल देनी॥५॥

भावार्थ: विधि और निषेध ( यह करो और यह न करो ) रूपी कर्मोंकी कथा कलियुगके पापोंको हरनेवाली सूर्यतनया यमुनाजी हैं और भगवान्‌ विष्णु और शङ्करजीकी कथाएँ त्रिवेणीरूपसे सुशोभित हैं, जो सुनते ही सब आनन्द और कल्याणोंकी देनेवाली हैं॥५॥

**चौ०** 
> बटु बिस्वास अचल निज धरमा। तीरथराज समाज सुकरमा॥  
> सबहि सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत सादर समन कलेसा॥६॥

भावार्थ: [ उस संतसमाजरूपी प्रयागमें ] अपने धर्ममें जो अटल विश्वास है वह अक्षयवट है, और शुभकर्म ही उस तीर्थराजका समाज ( परिकर ) है। वह ( संतसमाजरूपी प्रयागराज ) सब देशोंमें, सब समय सभीको सहजहीमें प्राप्त हो सकता है और आदरपूर्वक सेवन करनेसे क्लेशोंको नष्ट करनेवाला है॥६॥

**चौ०** 
> अकथ अलौकिक तीरथराऊ। देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ॥७॥

भावार्थ: वह तीर्थराज अलौकिक और अकथनीय है, एवं तत्काल फल देनेवाला है; उसका प्रभाव प्रत्यक्ष है॥७॥

**दो०** 
> सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।  
> लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग॥२॥

भावार्थ: जो मनुष्य इस संत-समाजरूपी तीर्थराजका प्रभाव प्रसन्न मनसे सुनते और समझते हैं और फिर अत्यन्त प्रेमपूर्वक इसमें गोते लगाते हैं, वे इस शरीरके रहते ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चारों फल पा जाते हैं॥२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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