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title: "बालकाण्ड दोहा 198"
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# बालकाण्ड · दोहा 198

**चौ०** 
> धरे नाम गुर हृदयँ बिचारी। बेद तत्व नृप तव सुत चारी॥  
> मुनि धन जन सरबस सिव प्राना। बाल केलि रस तेहिं सुख माना॥१॥

भावार्थ: गुरुजीने हृदयमें विचारकर ये नाम रखे [और कहा—] हे राजन्! तुम्हारे चारों पुत्र वेदके तत्त्व (साक्षात्‌ परात्पर भगवान्) हैं। जो मुनियोंके धन, भक्तोंके सर्वस्व और शिवजीके प्राण हैं, उन्होंने [इस समय तुम लोगोंके प्रेमवश] बाललीलाके रसमें सुख माना है॥१॥

**चौ०** 
> बारेहि ते निज हित पति जानी। लछिमन राम चरन रति मानी॥  
> भरत सत्रुहन दूनउ भाई। प्रभु सेवक जसि प्रीति बड़ाई॥२॥

भावार्थ: बचपनसे ही श्रीरामचन्द्रजीको अपना परम हितैषी स्वामी जानकर लक्ष्मणजीने उनके चरणोंमें प्रीति जोड़ ली। भरत और शत्रुघ्न दोनों भाइयोंमें स्वामी और सेवककी जिस प्रीतिकी प्रशंसा है वैसी प्रीति हो गयी॥२॥

**चौ०** 
> स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी। निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी॥  
> चारिउ सील रूप गुन धामा। तदपि अधिक सुखसागर रामा॥३॥

भावार्थ: श्याम और गौर शरीरवाली दोनों सुन्दर जोड़ियोंकी शोभाको देखकर माताएँ तृण तोड़ती हैं [जिसमें दीठ न लग जाय]। यों तो चारों ही पुत्र शील, रूप और गुणके धाम हैं, तो भी सुखके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी सबसे अधिक हैं॥३॥

**चौ०** 
> हृदयँ अनुग्रह इंदु प्रकासा। सूचत किरन मनोहर हासा॥  
> कबहुँ उछंग कबहुँ बर पलना। मातु दुलारइ कहि प्रिय ललना॥४॥

भावार्थ: उनके हृदयमें कृपारूपी चन्द्रमा प्रकाशित है। उनकी मनको हरनेवाली हँसी उस (कृपारूपी चन्द्रमा) की किरणोंको सूचित करती है। कभी गोदमें [लेकर] और कभी उत्तम पालनेमें [लिटाकर] माता ‘प्यारे ललना!’ कहकर दुलार करती है॥४॥

**दो०** 
> ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद।  
> सो अज प्रेम भगति बस कौसल्या कें गोद॥१९८॥

भावार्थ: जो सर्वव्यापक, निरञ्जन (मायारहित), निर्गुण, विनोदरहित और अजन्मा ब्रह्म हैं, वही प्रेम और भक्तिके वश कौसल्याजीकी गोदमें [खेल रहे] हैं॥१९८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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