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title: "बालकाण्ड दोहा 194"
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# बालकाण्ड · दोहा 194

**चौ०** 
> ध्वज पताक तोरन पुर छावा। कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा॥  
> सुमनबृष्टि अकास तें होई। ब्रह्मानंद मगन सब लोई॥१॥

भावार्थ: ध्वजा, पताका और तोरणोंसे नगर छा गया। जिस प्रकारसे वह सजाया गया, उसका तो वर्णन ही नहीं हो सकता। आकाशसे फूलोंकी वर्षा हो रही है, सब लोग ब्रह्मानन्दमें मग्न हैं॥१॥

**चौ०** 
> बृंद बृंद मिलि चलीं लोगाईं। सहज सिंगार किएँ उठि धाईं॥  
> कनक कलस मंगल भरि थारा। गावत पैठहिं भूप दुआरा॥२॥

भावार्थ: स्त्रियाँ झुंड-की-झुंड मिलकर चलीं। स्वाभाविक शृंगार किये ही वे उठ दौड़ीं। सोनेका कलश लेकर और थालोंमें मङ्गल-द्रव्य भरकर गाती हुई राजद्वारमें प्रवेश करती हैं॥२॥

**चौ०** 
> करि आरति नेवछावरि करहीं। बार बार सिसु चरनन्हि परहीं॥  
> मागध सूत बंदिगन गायक। पावन गुन गावहिं रघुनायक॥३॥

भावार्थ: वे आरती करके निछावर करती हैं और बार-बार बच्चेके चरणोंपर गिरती हैं। मागध, सूत, वन्दीजन और गवैये रघुकुलके स्वामीके पवित्र गुणोंका गान करते हैं॥३॥

**चौ०** 
> सर्बस दान दीन्ह सब काहू। जेहिं पावा राखा नहिं ताहू॥  
> मृगमद चंदन कुंकुम कीचा। मची सकल बीथिन्ह बिच बीचा॥४॥

भावार्थ: राजाने सब किसीको भरपूर दान दिया। जिसने पाया उसने भी नहीं रखा (लुटा दिया)। [नगरकी] सभी गलियोंके बीच-बीचमें कस्तूरी, चन्दन और केसरकी कीच मच गयी॥४॥

**दो०** 
> गृह गृह बाज बधाव सुभ प्रगटे सुषमा कंद।  
> हरषवंत सब जहँ तहँ नगर नारि नर बृंद॥ १९४॥

भावार्थ: घर-घर मङ्गलमय बधावा बजने लगा, क्योंकि शोभाके मूल भगवान्‌ प्रकट हुए हैं। नगरके स्त्री-पुरुषोंके झुंड-के-झुंड जहाँ-तहाँ आनन्दमग्न हो रहे हैं॥ १९४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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