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title: "बालकाण्ड दोहा 193"
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# बालकाण्ड · दोहा 193

**चौ०** 
> सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। संभ्रम चलि आईं सब रानी॥  
> हरषित जहँ तहँ धाईं दासी। आनँद मगन सकल पुरबासी॥ १ ॥

भावार्थ: बच्चेके रोनेकी बहुत ही प्यारी ध्वनि सुनकर सब रानियाँ उतावली होकर दौड़ी चली आयीं। दासियाँ हर्षित होकर जहाँ-तहाँ दौड़ीं। सारे पुरवासी आनन्दमें मग्न हो गये॥ १ ॥

**चौ०** 
> दसरथ पुत्रजन्म सुनि काना। मानहुँ ब्रह्मानंद समाना॥  
> परम प्रेम मन पुलक सरीरा। चाहत उठन करत मति धीरा॥२॥

भावार्थ: राजा दशरथजी पुत्रका जन्म कानोंसे सुनकर मानो ब्रह्मानन्दमें समा गये। मनमें अतिशय प्रेम है, शरीर पुलकित हो गया। [ आनन्दमें अधीर हुई ] बुद्धिको धीरज देकर [ और प्रेममें शिथिल हुए शरीरको सँभालकर ] वे उठना चाहते हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> जाकर नाम सुनत सुभ होई। मोरें गृह आवा प्रभु सोई॥  
> परमानंद पूरि मन राजा। कहा बोलाइ बजावहु बाजा॥३॥

भावार्थ: जिनका नाम सुननेसे ही कल्याण होता है, वही प्रभु मेरे घर आये हैं। [ यह सोचकर ] राजाका मन परम आनन्दसे पूर्ण हो गया। उन्होंने बाजेवालोंको बुलाकर कहा कि बाजा बजाओ॥ ३ ॥

**चौ०** 
> गुर बसिष्ठ कहँ गयउ हँकारा। आए द्विजन सहित नृपद्वारा॥  
> अनुपम बालक देखेन्हि जाई। रूप रासि गुन कहि न सिराई॥ ४ ॥

भावार्थ: गुरु वसिष्ठजीके पास बुलावा गया। वे ब्राह्मणोंको साथ लिये राजद्वारपर आये। उन्होंने जाकर अनुपम बालकको देखा, जो रूपकी राशि है और जिसके गुण कहनेसे समाप्त नहीं होते॥ ४ ॥

**दो०** 
> नंदीमुख सराध करि जातकरम सब कीन्ह।  
> हाटक धेनु बसन मनि नृप बिप्रन्ह कहँ दीन्ह॥१९३॥

भावार्थ: फिर राजाने नान्दीमुख श्राद्ध करके सब जातकर्म-संस्कार आदि किये और ब्राह्मणोंको सोना, गौ, वस्त्र और मणियोंका दान दिया॥ १९३ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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