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title: "बालकाण्ड दोहा 187"
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# बालकाण्ड · दोहा 187

**चौ०** 
> जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा॥  
> अंसन्ह सहित मनुज अवतारा। लेहउँ दिनकर बंस उदारा॥१॥

भावार्थ: हे मुनि, सिद्ध और देवताओंके स्वामियो! डरो मत। तुम्हारे लिये मैं मनुष्यका रूप धारण करूँगा और उदार ( पवित्र ) सूर्यवंशमें अंशोंसहित मनुष्यका अवतार लूँगा॥ १ ॥

**चौ०** 
> कस्यप अदिति महातप कीन्हा। तिन्ह कहुँ मैं पूरब बर दीन्हा॥  
> ते दसरथ कौसल्या रूपा। कोसलपुरीं प्रगट नरभूपा॥२॥

भावार्थ: कश्यप और अदितिने बड़ा भारी तप किया था। मैं पहले ही उनको वर दे चुका हूँ। वे ही दशरथ और कौसल्याके रूपमें मनुष्योंके राजा होकर श्रीअयोध्यापुरीमें प्रकट हुए हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> तिन्ह कें गृह अवतरिहउँ जाई। रघुकुल तिलक सो चारिउ भाई॥  
> नारद बचन सत्य सब करिहउँ। परम सक्ति समेत अवतरिहउँ॥३॥

भावार्थ: उन्हींके घर जाकर मैं रघुकुलमें श्रेष्ठ चार भाइयोंके रूपमें अवतार लूँगा। नारदके सब वचन मैं सत्य करूँगा और अपनी पराशक्तिके सहित अवतार लूँगा॥ ३ ॥

**चौ०** 
> हरिहउँ सकल भूमि गरुआई। निर्भय होहु देव समुदाई॥  
> गगन ब्रह्मबानी सुनि काना। तुरत फिरे सुर हृदय जुड़ाना॥४॥

भावार्थ: मैं पृथ्वीका सब भार हर लूँगा। हे देववृन्द! तुम निर्भय हो जाओ। आकाशमें ब्रह्म( भगवान्‌)की वाणीको कानसे सुनकर देवता तुरंत लौट गये। उनका हृदय शीतल हो गया॥ ४ ॥

**चौ०** 
> तब ब्रह्माँ धरनिहि समुझावा। अभय भई भरोस जियँ आवा॥५॥

भावार्थ: तब ब्रह्माजीने पृथ्वीको समझाया। वह भी निर्भय हुई और उसके जीमें भरोसा ( ढाढ़स ) आ गया॥ ५ ॥

**दो०** 
> निज लोकहि बिरंचि गे देवन्ह इहइ सिखाइ।  
> बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ॥१८७॥

भावार्थ: देवताओंको यही सिखाकर कि वानरोंका शरीर धर-धरकर तुमलोग पृथ्वीपर जाकर भगवान्‌के चरणोंकी सेवा करो, ब्रह्माजी अपने लोकको चले गये॥ १८७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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