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title: "बालकाण्ड दोहा 185"
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# बालकाण्ड · दोहा 185

**चौ०** 
> बैठे सुर सब करहिं बिचारा। कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा॥  
> पुर बैकुंठ जान कह कोई। कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई॥१॥

भावार्थ: सब देवता बैठकर विचार करने लगे कि प्रभुको कहाँ पावें ताकि उनके सामने पुकार ( फर्याद ) करें। कोई वैकुण्ठपुरी जानेको कहता था और कोई कहता था कि वही प्रभु क्षीरसमुद्रमें निवास करते हैं॥१॥

**चौ०** 
> जाके हृदयँ भगति जसि प्रीती। प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती॥  
> तेहिं समाज गिरिजा मैं रहेऊँ। अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ॥२॥

भावार्थ: जिसके हृदयमें जैसी भक्ति और प्रीति होती है, प्रभु वहाँ ( उसके लिये ) सदा उसी रीतिसे प्रकट होते हैं। हे पार्वती! उस समाजमें मैं भी था। अवसर पाकर मैंने एक बात कही— ॥२॥

**चौ०** 
> हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥  
> देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं॥३॥

भावार्थ: मैं तो यह जानता हूँ कि भगवान्‌ सब जगह समान रूपसे व्यापक हैं, प्रेमसे वे प्रकट हो जाते हैं। देश, काल, दिशा, विदिशामें बताओ, ऐसी जगह कहाँ है, जहाँ प्रभु न हों॥३॥

**चौ०** 
> अग जगमय सब रहित बिरागी। प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी॥  
> मोर बचन सब के मन माना। साधु साधु करि ब्रह्म बखाना॥४॥

भावार्थ: वे चराचरमय ( चराचरमें व्याप्त ) होते हुए ही सबसे रहित हैं और विरक्त हैं ( उनकी कहीं आसक्ति नहीं है ); वे प्रेमसे प्रकट होते हैं, जैसे अग्नि। ( अग्नि अव्यक्तरूपसे सर्वत्र व्याप्त है, परन्तु जहाँ उसके लिये अरणिमन्थनादि साधन किये जाते हैं, वहाँ वह प्रकट होती है। इसी प्रकार सर्वत्र व्याप्त भगवान्‌ भी प्रेमसे प्रकट होते हैं। ) मेरी बात सबको प्रिय लगी। ब्रह्माजीने ‘साधु, साधु’ कहकर बड़ाई की॥४॥

**दो०** 
> सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर।  
> अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर॥१८५॥

भावार्थ: मेरी बात सुनकर ब्रह्माजीके मनमें बड़ा हर्ष हुआ; उनका तन पुलकित हो गया और नेत्रोंसे [ प्रेमके ] आँसू बहने लगे। तब वे धीरबुद्धि ब्रह्माजी सावधान होकर हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे— ॥१८५॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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