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title: "बालकाण्ड दोहा 184"
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# बालकाण्ड · दोहा 184

**चौ०** 
> बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा॥  
> मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा॥१॥

भावार्थ: पराये धन और परायी स्त्रीपर मन चलानेवाले, दुष्ट, चोर और जुआरी बहुत बढ़ गये। लोग माता-पिता और देवताओंको नहीं मानते थे और साधुओं [ की सेवा करना तो दूर रहा, उलटे उन ] से सेवा करवाते थे॥१॥

**चौ०** 
> जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी॥  
> अतिसय देखि धर्म कै ग्लानी। परम सभीत धरा अकुलानी॥२॥

भावार्थ: [ श्रीशिवजी कहते हैं कि— ] हे भवानी! जिनके ऐसे आचरण हैं, उन सब प्राणियोंको राक्षस ही समझना। इस प्रकार धर्मके प्रति [ लोगोंकी ] अतिशय ग्लानि ( अरुचि, अनास्था ) देखकर पृथ्वी अत्यन्त भयभीत एवं व्याकुल हो गयी॥२॥

**चौ०** 
> गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही। जस मोहि गरुअ एक परद्रोही॥  
> सकल धर्म देखइ बिपरीता। कहि न सकइ रावन भय भीता॥३॥

भावार्थ: [ वह सोचने लगी कि ] पर्वतों, नदियों और समुद्रोंका बोझ मुझे इतना भारी नहीं जान पड़ता, जितना भारी मुझे एक परद्रोही ( दूसरोंका अनिष्ट करनेवाला ) लगता है। पृथ्वी सारे धर्मोंको विपरीत देख रही है, पर रावणसे भयभीत हुई वह कुछ बोल नहीं सकती॥३॥

**चौ०** 
> धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी। गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी॥  
> निज संताप सुनाएसि रोई। काहू तें कछु काज न होई॥४॥

भावार्थ: [ अन्तमें ] हृदयमें सोच-विचारकर, गौका रूप धारण कर धरती वहाँ गयी, जहाँ सब देवता और मुनि [ छिपे ] थे। पृथ्वीने रोकर उनको अपना दुःख सुनाया, पर किसीसे कुछ काम न बना॥४॥

**छं०** 
> सुर मुनि गंधर्बा मिलि करि सर्बा गे बिरंचि के लोका।  
> सँग गोतनुधारी भूमि बिचारी परम बिकल भय सोका॥  
> ब्रह्माँ सब जाना मन अनुमाना मोर कछू न बसाई।  
> जा करि तैं दासी सो अबिनासी हमरेउ तोर सहाई॥

भावार्थ: तब देवता, मुनि और गन्धर्व सब मिलकर ब्रह्माजीके लोक ( सत्यलोक ) को गये। भय और शोकसे अत्यन्त व्याकुल बेचारी पृथ्वी भी गौका शरीर धारण किये हुए उनके साथ थी। ब्रह्माजी सब जान गये। उन्होंने मनमें अनुमान किया कि इसमें मेरा कुछ भी वश नहीं चलनेका। [ तब उन्होंने पृथ्वीसे कहा कि— ] जिसकी तू दासी है, वही अविनाशी हमारा और तुम्हारा दोनोंका सहायक है।

**सो०** 
> धरनि धरहि मन धीर कह बिरंचि हरि पद सुमिरु।  
> जानत जन की पीर प्रभु भंजिहि दारुन बिपति॥१८४॥

भावार्थ: ब्रह्माजीने कहा—हे धरती! मनमें धीरज धारण करके श्रीहरिके चरणोंका स्मरण करो। प्रभु अपने दासोंकी पीड़ाको जानते हैं, ये तुम्हारी कठिन विपत्तिका नाश करेंगे॥१८४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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