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title: "बालकाण्ड दोहा 18"
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# बालकाण्ड · दोहा 18

श्रीनाम-वन्दना और नाम-महिमा

**चौ०** 
> कपिपति रीछ निसाचर राजा। अंगदादि जे कीस समाजा॥  
> बंदउँ सब के चरन सुहाए। अधम सरीर राम जिन्ह पाए॥१॥

भावार्थ: वानरोंके राजा सुग्रीवजी, रीछोंके राजा जाम्बवान्‌जी, राक्षसोंके राजा विभीषणजी और अंगदजी आदि जितना वानरोंका समाज है, सबके सुन्दर चरणोंकी मैं वन्दना करता हूँ, जिन्होंने अधम ( पशु और राक्षस आदि ) शरीरमें भी श्रीरामचन्द्रजीको प्राप्त कर लिया॥१॥

**चौ०** 
> रघुपति चरन उपासक जेते। खग मृग सुर नर असुर समेते॥  
> बंदउँ पद सरोज सब केरे। जे बिनु काम राम के चेरे॥२॥

भावार्थ: पशु, पक्षी, देवता, मनुष्य, असुरसमेत जितने श्रीरामजीके चरणोंके उपासक हैं, मैं उन सबके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ, जो श्रीरामजीके निष्काम सेवक हैं॥२॥

**चौ०** 
> सुक सनकादि भगत मुनि नारद। जे मुनिबर बिग्यान बिसारद॥  
> प्रनवउँ सबहि धरनि धरि सीसा। करहु कृपा जन जानि मुनीसा॥३॥

भावार्थ: शुकदेवजी, सनकादि, नारदमुनि आदि जितने भक्त और परम ज्ञानी श्रेष्ठ मुनि हैं, मैं धरतीपर सिर टेककर उन सबको प्रणाम करता हूँ; हे मुनीश्वरो! आप सब मुझको अपना दास जानकर कृपा कीजिये॥३॥

**चौ०** 
> जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥  
> ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥४॥

भावार्थ: राजा जनककी पुत्री, जगत्‌की माता और करुणानिधान श्रीरामचन्द्रजीकी प्रियतमा श्रीजानकीजीके दोनों चरणकमलोंको मैं मनाता हूँ, जिनकी कृपासे निर्मल बुद्धि पाऊँ॥४॥

**चौ०** 
> पुनि मन बचन कर्म रघुनायक। चरन कमल बंदउँ सब लायक॥  
> राजिवनयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुखदायक॥ ५॥

भावार्थ: फिर मैं मन, वचन और कर्मसे कमलनयन, धनुष-बाणधारी, भक्तोंकी विपत्तिका नाश करने और उन्हें सुख देनेवाले भगवान्‌ श्रीरघुनाथजीके सर्वसमर्थ चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ॥५॥

**दो०** 
> गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।  
> बंदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न॥१८॥

भावार्थ: जो वाणी और उसके अर्थ तथा जल और जलकी लहरके समान कहनेमें अलग-अलग हैं, परन्तु वास्तवमें अभिन्न ( एक ) हैं, उन श्रीसीतारामजीके चरणोंकी मैं वन्दना करता हूँ, जिन्हें दीन-दुखी बहुत ही प्रिय हैं॥१८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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