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title: "बालकाण्ड दोहा 179"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-179"
lang: "hi"
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# बालकाण्ड · दोहा 179

**चौ०** 
> रहे तहाँ निसिचर भट भारे। ते सब सुरन्ह समर संघारे॥  
> अब तहँ रहहिं सक्र के प्रेरे। रच्छक कोटि जच्छपति केरे॥१॥

भावार्थ: [ पहले ] वहाँ बड़े-बड़े योद्धा राक्षस रहते थे। देवताओंने उन सबको युद्धमें मार डाला। अब इन्द्रकी प्रेरणासे वहाँ कुबेरके एक करोड़ रक्षक ( यक्ष लोग ) रहते हैं—॥१॥

**चौ०** 
> दसमुख कतहुँ खबरि असि पाई। सेन साजि गढ़ घेरेसि जाई॥  
> देखि बिकट भट बड़ि कटकाई। जच्छ जीव लै गए पराई॥२॥

भावार्थ: रावणको कहीं ऐसी खबर मिली तब उसने सेना सजाकर किलेको जा घेरा। उस बड़े विकट योद्धा और उसकी बड़ी सेनाको देखकर यक्ष अपने प्राण लेकर भाग गये॥२॥

**चौ०** 
> फिरि सब नगर दसानन देखा। गयउ सोच सुख भयउ बिसेषा॥  
> सुंदर सहज अगम अनुमानी। कीन्हि तहाँ रावन रजधानी॥३॥

भावार्थ: तब रावणने घूम-फिरकर सारा नगर देखा, उसकी [ स्थानसम्बन्धी ] चिन्ता मिट गयी और उसे बहुत ही सुख हुआ। उस पुरीको स्वाभाविक ही सुन्दर और [ बाहरवालोंके लिये ] दुर्गम अनुमान करके रावणने वहाँ अपनी राजधानी कायम की॥३॥

**चौ०** 
> जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हे। सुखी सकल रजनीचर कीन्हे॥  
> एक बार कुबेर पर धावा। पुष्पक जान जीति लै आवा॥४॥

भावार्थ: योग्यताके अनुसार घरोंको बाँटकर रावणने सब राक्षसोंको सुखी किया। एक बार वह कुबेरपर चढ़ दौड़ा और उससे पुष्पकविमानको जीतकर ले आया॥४॥

**दो०** 
> कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ।  
> मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला बहुत सुख पाइ॥१७९॥

भावार्थ: फिर उसने जाकर [ एक बार ] खिलवाड़हीमें कैलास पर्वतको उठा लिया और मानो अपनी भुजाओंका बल तौलकर, बहुत सुख पाकर वह वहाँसे चला आया॥१७९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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