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title: "बालकाण्ड दोहा 177"
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# बालकाण्ड · दोहा 177

**चौ०** 
> कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई। परम उग्र नहिं बरनि सो जाई॥  
> गयउ निकट तप देखि बिधाता। मागहु बर प्रसन्न मैं ताता॥१॥

भावार्थ: तीनों भाइयोंने अनेकों प्रकारकी बड़ी ही कठिन तपस्या की, जिसका वर्णन नहीं हो सकता। [ उनका उग्र ] तप देखकर ब्रह्माजी उनके पास गये और बोले—हे तात! मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो॥१॥

**चौ०** 
> करि बिनती पद गहि दससीसा। बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा॥  
> हम काहू के मरहिं न मारें। बानर मनुज जाति दुइ बारें॥२॥

भावार्थ: रावणने विनय करके और चरण पकड़कर कहा—हे जगदीश्वर! सुनिये, वानर और मनुष्य—इन दो जातियोंको छोड़कर हम और किसीके मारे न मरें [ यह वर दीजिये ]॥२॥

**चौ०** 
> एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा। मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा॥  
> पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ। तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ॥३॥

भावार्थ: [ शिवजी कहते हैं कि— ] मैंने और ब्रह्माने मिलकर उसे वर दिया कि ऐसा ही हो, तुमने बड़ा तप किया है। फिर ब्रह्माजी कुम्भकर्णके पास गये। उसे देखकर उनके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ॥३॥

**चौ०** 
> जौं एहिं खल नित करब अहारू। होइहि सब उजारि संसारू॥  
> सारद प्रेरि तासु मति फेरी। मागेसि नीद मास षट केरी॥४॥

भावार्थ: जो यह दुष्ट नित्य आहार करेगा, तो सारा संसार ही उजाड़ हो जायगा। [ ऐसा विचारकर ] ब्रह्माजीने सरस्वतीको प्रेरणा करके उसकी बुद्धि फेर दी। [ जिससे ] उसने छः महीनेकी नींद माँगी॥४॥

**दो०** 
> गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु।  
> तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु॥१७७॥

भावार्थ: फिर ब्रह्माजी विभीषणके पास गये और बोले—हे पुत्र! वर माँगो। उसने भगवान्‌के चरणकमलोंमें निर्मल ( निष्काम और अनन्य ) प्रेम माँगा॥१७७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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