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title: "बालकाण्ड दोहा 176"
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lang: "hi"
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# बालकाण्ड · दोहा 176

**चौ०** 
> काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा। भयउ निसाचर सहित समाजा॥  
> दस सिर ताहि बीस भुजदंडा। रावन नाम बीर बरिबंडा॥१॥

भावार्थ: हे मुनि! सुनो, समय पाकर वही राजा परिवारसहित रावण नामक राक्षस हुआ। उसके दस सिर और बीस भुजाएँ थीं और वह बड़ा ही प्रचण्ड शूरवीर था॥१॥

**चौ०** 
> भूप अनुज अरिमर्दन नामा। भयउ सो कुंभकरन बलधामा॥  
> सचिव जो रहा धरमरुचि जासू। भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू॥२॥

भावार्थ: अरिमर्दन नामक जो राजाका छोटा भाई था, वह बलका धाम कुम्भकर्ण हुआ। उसका जो मन्त्री था, जिसका नाम धर्मरुचि था, वह रावणका सौतेला छोटा भाई हुआ॥२॥

**चौ०** 
> नाम बिभीषन जेहि जग जाना। बिष्नुभगत बिग्यान निधाना॥  
> रहे जे सुत सेवक नृप केरे। भए निसाचर घोर घनेरे॥३॥

भावार्थ: उसका विभीषण नाम था, जिसे सारा जगत्‌ जानता है। वह विष्णुभक्त और ज्ञान-विज्ञानका भण्डार था और जो राजाके पुत्र और सेवक थे, वे सभी बड़े भयानक राक्षस हुए॥३॥

**चौ०** 
> कामरूप खल जिनस अनेका। कुटिल भयंकर बिगत बिबेका॥  
> कृपा रहित हिंसक सब पापी। बरनि न जाहिं बिस्व परितापी॥४॥

भावार्थ: वे सब अनेकों जातिके, मनमाना रूप धारण करनेवाले, दुष्ट, कुटिल, भयंकर, विवेकरहित, निर्दयी, हिंसक, पापी और संसारभरको दुःख देनेवाले हुए; उनका वर्णन नहीं हो सकता॥४॥

**दो०** 
> उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप।  
> तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप॥१७६॥

भावार्थ: यद्यपि वे पुलस्त्य ऋषिके पवित्र, निर्मल और अनुपम कुलमें उत्पन्न हुए, तथापि ब्राह्मणोंके शापके कारण वे सब पापरूप हुए॥१७६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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