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title: "बालकाण्ड दोहा 174"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-174"
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# बालकाण्ड · दोहा 174

**चौ०** 
> छत्रबंधु तैं बिप्र बोलाई। घालै लिए सहित समुदाई॥  
> ईस्वर राखा धरम हमारा। जैहसि तैं समेत परिवारा॥१॥

भावार्थ: रे नीच क्षत्रिय! तूने तो परिवारसहित ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्हें नष्ट करना चाहा था, ईश्वरने हमारे धर्मकी रक्षा की। अब तू परिवारसहित नष्ट होगा॥१॥

**चौ०** 
> संबत मध्य नास तव होऊ। जलदाता न रहिहि कुल कोऊ॥  
> नृप सुनि श्राप बिकल अति त्रासा। भै बहोरि बर गिरा अकासा॥२॥

भावार्थ: एक वर्षके भीतर तेरा नाश हो जाय, तेरे कुलमें कोई पानी देनेवालातक न रहेगा। शाप सुनकर राजा भयके मारे अत्यन्त व्याकुल हो गया। फिर सुन्दर आकाशवाणी हुई—॥२॥

**चौ०** 
> बिप्रहु श्राप बिचारि न दीन्हा। नहिं अपराध भूप कछु कीन्हा॥  
> चकित बिप्र सब सुनि नभबानी। भूप गयउ जहँ भोजन खानी॥३॥

भावार्थ: हे ब्राह्मणो! तुमने विचारकर शाप नहीं दिया। राजाने कुछ भी अपराध नहीं किया। आकाशवाणी सुनकर सब ब्राह्मण चकित हो गये। तब राजा वहाँ गया, जहाँ भोजन बना था॥३॥

**चौ०** 
> तहँ न असन नहिं बिप्र सुआरा। फिरेउ राउ मन सोच अपारा॥  
> सब प्रसंग महिसुरन्ह सुनाई। त्रसित परेउ अवनीं अकुलाई॥४॥

भावार्थ: [ देखा तो ] वहाँ न भोजन था, न रसोइया ब्राह्मण ही था। तब राजा मनमें अपार चिन्ता करता हुआ लौटा। उसने ब्राह्मणोंको सब वृत्तान्त सुनाया और [ बड़ा ही ] भयभीत और व्याकुल होकर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा॥४॥

**दो०** 
> भूपति भावी मिटइ नहिं जदपि न दूषन तोर।  
> किएँ अन्यथा होइ नहिं बिप्रश्राप अति घोर॥१७४॥

भावार्थ: हे राजन्! यद्यपि तुम्हारा दोष नहीं है, तो भी होनहार नहीं मिटता। ब्राह्मणोंका शाप बहुत ही भयानक होता है, यह किसी तरह भी टाले टल नहीं सकता॥१७४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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