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title: "बालकाण्ड दोहा 171"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-171"
lang: "hi"
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# बालकाण्ड · दोहा 171

**चौ०** 
> तापस नृप निज सखहि निहारी। हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी॥  
> मित्रहि कहि सब कथा सुनाई। जातुधान बोला सुख पाई॥१॥

भावार्थ: तपस्वी राजा अपने मित्रको देख प्रसन्न हो उठकर मिला और सुखी हुआ। उसने मित्रको सब कथा कह सुनायी, तब राक्षस आनन्दित होकर बोला॥१॥

**चौ०** 
> अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा। जौं तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा॥  
> परिहरि सोच रहहु तुम्ह सोई। बिनु औषध बिआधि बिधि खोई॥२॥

भावार्थ: हे राजन्! सुनो, जब तुमने मेरे कहनेके अनुसार [ इतना ] काम कर लिया, तो अब मैंने शत्रुको काबूमें कर ही लिया [ समझो ]। तुम अब चिन्ता त्याग सो रहो। विधाताने बिना ही दवाके रोग दूर कर दिया॥२॥

**चौ०** 
> कुल समेत रिपु मूल बहाई। चौथें दिवस मिलब मैं आई॥  
> तापस नृपहि बहुत परितोषी। चला महाकपटी अतिरोषी॥३॥

भावार्थ: कुलसहित शत्रुको जड़-मूलसे उखाड़-बहाकर, [ आजसे ] चौथे दिन मैं तुमसे आ मिलूँगा। [ इस प्रकार ] तपस्वी राजाको खूब दिलासा देकर वह महामायावी और अत्यन्त क्रोधी राक्षस चला॥३॥

**चौ०** 
> भानुप्रतापहि बाजि समेता। पहुँचाएसि छन माझ निकेता॥  
> नृपहि नारि पहिं सयन कराई। हयगृहँ बाँधेसि बाजि बनाई॥४॥

भावार्थ: उसने प्रतापभानु राजाको घोड़ेसहित क्षणभरमें घर पहुँचा दिया। राजाको रानीके पास सुलाकर घोड़ेको अच्छी तरहसे घुड़सालमें बाँध दिया॥४॥

**दो०** 
> राजा के उपरोहितहि हरि लै गयउ बहोरि।  
> लै राखेसि गिरि खोह महुँ मायाँ करि मति भोरि॥१७१॥

भावार्थ: फिर वह राजाके पुरोहितको उठा ले गया और मायासे उसकी बुद्धिको भ्रममें डालकर उसे उसने पहाड़की खोहमें ला रखा॥१७१॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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