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title: "बालकाण्ड दोहा 170"
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# बालकाण्ड · दोहा 170

**चौ०** 
> सयन कीन्ह नृप आयसु मानी। आसन जाइ बैठ छलग्यानी॥  
> श्रमित भूप निद्रा अति आई। सो किमि सोव सोच अधिकाई॥१॥

भावार्थ: राजाने आज्ञा मानकर शयन किया और वह कपट-ज्ञानी आसनपर जा बैठा। राजा थका था, [उसे] खूब (गहरी) नींद आ गयी। पर वह कपटी कैसे सोता। उसे तो बहुत चिन्ता हो रही थी॥ १॥

**चौ०** 
> कालकेतु निसिचर तहँ आवा। जेहिं सूकर होइ नृपहि भुलावा॥  
> परम मित्र तापस नृप केरा। जानइ सो अति कपट घनेरा॥२॥

भावार्थ: [उसी समय] वहाँ कालकेतु राक्षस आया, जिसने सूअर बनकर राजाको भटकाया था। वह तपस्वी राजाका बड़ा मित्र था और खूब छल-प्रपञ्च जानता था॥ २॥

**चौ०** 
> तेहि के सत सुत अरु दस भाई। खल अति अजय देव दुखदाई॥  
> प्रथमहिं भूप समर सब मारे। बिप्र संत सुर देखि दुखारे॥३॥

भावार्थ: उसके सौ पुत्र और दस भाई थे, जो बड़े ही दुष्ट, किसीसे न जीते जानेवाले और देवताओंको दुःख देनेवाले थे। ब्राह्मणों, संतों और देवताओंको दुखी देखकर राजाने उन सबको पहले ही युद्धमें मार डाला था॥ ३॥

**चौ०** 
> तेहिं खल पाछिल बयरु सँभारा। तापस नृप मिलि मंत्र बिचारा॥  
> जेहिं रिपु छय सोइ रचेन्हि उपाऊ। भावी बस न जान कछु राऊ॥४॥

भावार्थ: उस दुष्टने पिछला वैर याद करके तपस्वी राजासे मिलकर सलाह विचारी (षड्‌यन्त्र किया) और जिस प्रकार शत्रुका नाश हो, वही उपाय रचा। भावीवश राजा (प्रतापभानु) कुछ भी न समझ सका॥ ४॥

**दो०** 
> रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु।  
> अजहुँ देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु॥१७०॥

भावार्थ: तेजस्वी शत्रु अकेला भी हो तो भी उसे छोटा नहीं समझना चाहिये। जिसका सिरमात्र बचा था, वह राहु आजतक सूर्य-चन्द्रमाको दुःख देता है॥ १७०॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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