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title: "बालकाण्ड दोहा 169"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-169"
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# बालकाण्ड · दोहा 169

**चौ०** 
> एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें। होइहहिं सकल बिप्र बस तोरें॥  
> करिहहिं बिप्र होम मख सेवा। तेहिं प्रसंग सहजेहिं बस देवा॥१॥

भावार्थ: हे राजन्! इस प्रकार बहुत ही थोड़े परिश्रमसे सब ब्राह्मण तुम्हारे वशमें हो जायँगे। ब्राह्मण हवन, यज्ञ और सेवा-पूजा करेंगे, तो उस प्रसंग (सम्बन्ध) से देवता भी सहज ही वशमें हो जायँगे॥ १॥

**चौ०** 
> और एक तोहि कहउँ लखाऊ। मैं एहि बेष न आउब काऊ॥  
> तुम्हरे उपरोहित कहुँ राया। हरि आनब मैं करि निज माया॥२॥

भावार्थ: मैं एक और पहचान तुमको बताये देता हूँ कि मैं इस रूपमें कभी न आऊँगा। हे राजन्! मैं अपनी मायासे तुम्हारे पुरोहितको हर लाऊँगा॥ २॥

**चौ०** 
> तपबल तेहि करि आपु समाना। रखिहउँ इहाँ बरष परवाना॥  
> मैं धरि तासु बेषु सुनु राजा। सब बिधि तोर सँवारब काजा॥३॥

भावार्थ: तपके बलसे उसे अपने समान बनाकर एक वर्षतक यहाँ रखूँगा और हे राजन्! सुनो, मैं उसका रूप बनाकर सब प्रकारसे तुम्हारा काम सिद्ध करूँगा॥ ३॥

**चौ०** 
> गै निसि बहुत सयन अब कीजे। मोहि तोहि भूप भेंट दिन तीजे॥  
> मैं तपबल तोहि तुरग समेता। पहुँचैहउँ सोवतहि निकेता॥४॥

भावार्थ: हे राजन्! रात बहुत बीत गयी, अब सो जाओ। आजसे तीसरे दिन मुझसे तुम्हारी भेंट होगी। तपके बलसे मैं घोड़ेसहित तुमको सोतेहीमें घर पहुँचा दूँगा॥ ४॥

**दो०** 
> मैं आउब सोइ बेषु धरि पहिचानेहु तब मोहि।  
> जब एकांत बोलाइ सब कथा सुनावौं तोहि॥१६९॥

भावार्थ: मैं वही (पुरोहितका) वेष धरकर आऊँगा। जब एकान्तमें तुमको बुलाकर सब कथा सुनाऊँगा, तब तुम मुझे पहचान लेना॥ १६९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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