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title: "बालकाण्ड दोहा 168"
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# बालकाण्ड · दोहा 168

**चौ०** 
> जानि नृपहि आपन आधीना। बोला तापस कपट प्रबीना॥  
> सत्य कहउँ भूपति सुनु तोही। जग नाहिन दुर्लभ कछु मोही॥१॥

भावार्थ: राजाको अपने अधीन जानकर कपटमें प्रवीण तपस्वी बोला—हे राजन्! सुनो, मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, जगत्‌में मुझे कुछ भी दुर्लभ नहीं है॥ १॥

**चौ०** 
> अवसि काज मैं करिहउँ तोरा। मन तन बचन भगत तैं मोरा॥  
> जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाऊ। फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ॥२॥

भावार्थ: मैं तुम्हारा काम अवश्य करूँगा; [क्योंकि] तुम मन, वाणी और शरीर [तीनों] से मेरे भक्त हो। पर योग, युक्ति, तप और मन्त्रका प्रभाव तभी फलीभूत होता है जब वे छिपाकर किये जाते हैं॥ २॥

**चौ०** 
> जौं नरेस मैं करौं रसोई। तुम्ह परुसहु मोहि जान न कोई॥  
> अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई। सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई॥३॥

भावार्थ: हे नरपति! मैं यदि रसोई बनाऊँ और तुम उसे परोसो और मुझे कोई जानने न पावे, तो उस अन्नको जो-जो खायगा, सो-सो तुम्हारा आज्ञाकारी बन जायगा॥ ३॥

**चौ०** 
> पुनि तिन्ह के गृह जेवँइ जोऊ। तव बस होइ भूप सुनु सोऊ॥  
> जाइ उपाय रचहु नृप एहू। संबत भरि संकलप करेहू॥४॥

भावार्थ: यही नहीं, उन (भोजन करनेवालों) के घर भी जो कोई भोजन करेगा, हे राजन्! सुनो, वह भी तुम्हारे अधीन हो जायगा। हे राजन्! जाकर यही उपाय करो और वर्षभर [भोजन कराने] का सङ्कल्प कर लेना॥ ४॥

**दो०** 
> नित नूतन द्विज सहस सत बरेहु सहित परिवार।  
> मैं तुम्हरे संकलप लगि दिनहिं करबि जेवनार॥१६८॥

भावार्थ: नित्य नये एक लाख ब्राह्मणोंको कुटुम्बसहित निमन्त्रित करना। मैं तुम्हारे सङ्कल्प [के काल अर्थात्‌ एक वर्ष] तक प्रतिदिन भोजन बना दिया करूँगा॥ १६८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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