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title: "बालकाण्ड दोहा 166"
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# बालकाण्ड · दोहा 166

**चौ०** 
> तातें मैं तोहि बरजउँ राजा। कहें कथा तव परम अकाजा॥  
> छठें श्रवन यह परत कहानी। नास तुम्हार सत्य मम बानी॥१॥

भावार्थ: हे राजन्! मैं तुमको इसलिये मना करता हूँ कि इस प्रसङ्गको कहनेसे तुम्हारी बड़ी हानि होगी। छठे कानमें यह बात पड़ते ही तुम्हारा नाश हो जायगा, मेरा यह वचन सत्य जानना॥ १॥

**चौ०** 
> यह प्रगटें अथवा द्विजश्रापा। नास तोर सुनु भानुप्रतापा॥  
> आन उपायँ निधन तव नाहीं। जौं हरि हर कोपहिं मन माहीं॥२॥

भावार्थ: हे प्रतापभानु! सुनो, इस बातको प्रकट करनेसे अथवा ब्राह्मणोंके शापसे तुम्हारा नाश होगा और किसी उपायसे, चाहे ब्रह्मा और शंकर भी मनमें क्रोध करें, तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी॥ २॥

**चौ०** 
> सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा। द्विज गुर कोप कहहु को राखा॥  
> राखइ गुर जौं कोप बिधाता। गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता॥३॥

भावार्थ: राजाने मुनिके चरण पकड़कर कहा—हे स्वामी! सत्य ही है। ब्राह्मण और गुरुके क्रोधसे, कहिये, कौन रक्षा कर सकता है? यदि ब्रह्मा भी क्रोध करें, तो गुरु बचा लेते हैं; पर गुरुसे विरोध करनेपर जगत्‌में कोई भी बचानेवाला नहीं है॥ ३॥

**चौ०** 
> जौं न चलब हम कहे तुम्हारें। होउ नास नहिं सोच हमारें॥  
> एकहिं डर डरपत मन मोरा। प्रभु महिदेव श्राप अति घोरा॥४॥

भावार्थ: यदि मैं आपके कथनके अनुसार नहीं चलूँगा, तो [भले ही] मेरा नाश हो जाय। मुझे इसकी चिन्ता नहीं है। मेरा मन तो हे प्रभो! [केवल] एक ही डरसे डर रहा है कि ब्राह्मणोंका शाप बड़ा भयानक होता है॥ ४॥

**दो०** 
> होहिं बिप्र बस कवन बिधि कहहु कृपा करि सोउ।  
> तुम्ह तजि दीनदयाल निज हितू न देखउँ कोउ॥१६६॥

भावार्थ: वे ब्राह्मण किस प्रकारसे वशमें हो सकते हैं, कृपा करके वह भी बताइये। हे दीनदयालु! आपको छोड़कर और किसीको मैं अपना हितू नहीं देखता॥ १६६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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