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title: "बालकाण्ड दोहा 164"
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# बालकाण्ड · दोहा 164

**चौ०** 
> नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा। सत्यकेतु तव पिता नरेसा॥  
> गुर प्रसाद सब जानिअ राजा। कहिअ न आपन जानि अकाजा॥१॥

भावार्थ: तुम्हारा नाम प्रतापभानु है, महाराज सत्यकेतु तुम्हारे पिता थे। हे राजन्! गुरुकी कृपासे मैं सब जानता हूँ, पर अपनी हानि समझकर कहता नहीं॥ १॥

**चौ०** 
> देखि तात तव सहज सुधाई। प्रीति प्रतीति नीति निपुनाई॥  
> उपजि परी ममता मन मोरें। कहउँ कथा निज पूछे तोरें॥२॥

भावार्थ: हे तात! तुम्हारा स्वाभाविक सीधापन (सरलता), प्रेम, विश्वास और नीतिमें निपुणता देखकर मेरे मनमें तुम्हारे ऊपर बड़ी ममता उत्पन्न हो गयी है; इसीलिये मैं तुम्हारे पूछनेपर अपनी कथा कहता हूँ॥ २॥

**चौ०** 
> अब प्रसन्न मैं संसय नाहीं। मागु जो भूप भाव मन माहीं॥  
> सुनि सुबचन भूपति हरषाना। गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना॥३॥

भावार्थ: अब मैं प्रसन्न हूँ, इसमें सन्देह न करना। हे राजन्! जो मनको भावे वही माँग लो। सुन्दर (प्रिय) वचन सुनकर राजा हर्षित हो गया और [मुनिके] पैर पकड़कर उसने बहुत प्रकारसे विनती की॥ ३॥

**चौ०** 
> कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें। चारि पदारथ करतल मोरें॥  
> प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी। मागि अगम बर होउँ असोकी॥४॥

भावार्थ: हे दयासागर मुनि! आपके दर्शनसे ही चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष) मेरी मुट्ठीमें आ गये। तो भी स्वामीको प्रसन्न देखकर मैं यह दुर्लभ वर माँगकर [क्यों न] शोकरहित हो जाऊँ॥ ४॥

**दो०** 
> जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ।  
> एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ॥१६४॥

भावार्थ: मेरा शरीर वृद्धावस्था, मृत्यु और दुःखसे रहित हो जाय; मुझे युद्धमें कोई जीत न सके और पृथ्वीपर मेरा सौ कल्पतक एकच्छत्र अकण्टक राज्य हो॥ १६४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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