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title: "बालकाण्ड दोहा 163"
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# बालकाण्ड · दोहा 163

**चौ०** 
> जनि आचरजु करहु मन माहीं। सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं॥  
> तपबल तें जग सृजइ बिधाता। तपबल बिष्नु भए परित्राता॥१॥

भावार्थ: हे पुत्र! मनमें आश्चर्य मत करो, तपसे कुछ भी दुर्लभ नहीं है, तपके बलसे ब्रह्मा जगत्‌को रचते हैं। तपहीके बलसे विष्णु संसारका पालन करनेवाले बने हैं॥ १॥

**चौ०** 
> तपबल संभु करहिं संघारा। तप तें अगम न कछु संसारा॥  
> भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा। कथा पुरातन कहै सो लागा॥२॥

भावार्थ: तपहीके बलसे रुद्र संहार करते हैं। संसारमें कोई ऐसी वस्तु नहीं जो तपसे न मिल सके। यह सुनकर राजाको बड़ा अनुराग हुआ। तब वह (तपस्वी) पुरानी कथाएँ कहने लगा॥ २॥

**चौ०** 
> करम धरम इतिहास अनेका। करइ निरूपन बिरति बिबेका॥  
> उदभव पालन प्रलय कहानी। कहेसि अमित आचरज बखानी॥३॥

भावार्थ: कर्म, धर्म और अनेकों प्रकारके इतिहास कहकर वह वैराग्य और ज्ञानका निरूपण करने लगा। सृष्टिकी उत्पत्ति, पालन (स्थिति) और संहार (प्रलय) की अपार आश्चर्यभरी कथाएँ उसने विस्तारसे कहीं॥ ३॥

**चौ०** 
> सुनि महीप तापस बस भयऊ। आपन नाम कहन तब लयऊ॥  
> कह तापस नृप जानउँ तोही। कीन्हेहु कपट लाग भल मोही॥४॥

भावार्थ: राजा सुनकर उस तपस्वीके वशमें हो गया और तब वह उसे अपना नाम बताने लगा। तपस्वीने कहा—राजन्! मैं तुमको जानता हूँ। तुमने कपट किया, वह मुझे अच्छा लगा॥ ४॥

**सो०** 
> सुनु महीस असि नीति जहँ तहँ नाम न कहहिं नृप।  
> मोहि तोहि पर अति प्रीति सोइ चतुरता बिचारि तव॥१६३॥

भावार्थ: हे राजन्! सुनो, ऐसी नीति है कि राजालोग जहाँ-तहाँ अपना नाम नहीं कहते। तुम्हारी वही चतुराई समझकर तुमपर मेरा बड़ा प्रेम हो गया है॥ १६३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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