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title: "बालकाण्ड दोहा 161b"
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# बालकाण्ड · दोहा 161b

**चौ०** 
> कह नृप जे बिग्यान निधाना। तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना॥  
> सदा रहहिं अपनपौ दुराएँ। सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ॥१॥

भावार्थ: राजाने कहा—जो आपके सदृश विज्ञानके निधान और सर्वथा अभिमानरहित होते हैं, वे अपने स्वरूपको सदा छिपाये रहते हैं। क्योंकि कुवेष बनाकर रहनेमें ही सब तरहका कल्याण है (प्रकट संतवेषमें मान होनेकी सम्भावना है और मानसे पतनकी)॥१॥

**चौ०** 
> तेहि तें कहहिं संत श्रुति टेरें। परम अकिंचन प्रिय हरि केरें॥  
> तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा। होत बिरंचि सिवहि संदेहा॥२॥

भावार्थ: इसीसे तो संत और वेद पुकारकर कहते हैं कि परम अकिञ्चन (सर्वथा अहंकार, ममता और मानरहित) ही भगवान्‌को प्रिय होते हैं। आप-सरीखे निर्धन, भिखारी और गृहहीनोंको देखकर ब्रह्मा और शिवजीको भी सन्देह हो जाता है [ कि वे वास्तविक संत हैं या भिखारी ]॥२॥

**चौ०** 
> जोसि सोसि तव चरन नमामी। मो पर कृपा करिअ अब स्वामी॥  
> सहज प्रीति भूपति कै देखी। आपु बिषय बिस्वास बिसेषी॥३॥

भावार्थ: आप जो हों सो हों (अर्थात्‌ जो कोई भी हों), मैं आपके चरणोंमें नमस्कार करता हूँ। हे स्वामी! अब मुझपर कृपा कीजिये। अपने ऊपर राजाकी स्वाभाविक प्रीति और अपने विषयमें उसका अधिक विश्वास देखकर—॥३॥

**चौ०** 
> सब प्रकार राजहि अपनाई। बोलेउ अधिक सनेह जनाई॥  
> सुनु सतिभाउ कहउँ महिपाला। इहाँ बसत बीते बहु काला॥४॥

भावार्थ: सब प्रकारसे राजाको अपने वशमें करके, अधिक स्नेह दिखाता हुआ वह (कपट-तपस्वी) बोला—हे राजन्‌! सुनो, मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, मुझे यहाँ रहते बहुत समय बीत गया॥४॥

**दो०** 
> अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु।  
> लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहु॥१६१ (क)॥

भावार्थ: अबतक न तो कोई मुझसे मिला और न मैं अपनेको किसीपर प्रकट करता हूँ; क्योंकि लोकमें प्रतिष्ठा अग्निके समान है जो तपरूपी वनको भस्म कर डालती है॥१६१ (क)॥

**सो०** 
> तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर।  
> सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि॥१६१ (ख)॥

भावार्थ: तुलसीदासजी कहते हैं—सुन्दर वेष देखकर मूढ़ नहीं, [ मूढ़ तो मूढ़ ही हैं, ] चतुर मनुष्य भी धोखा खा जाते हैं। सुन्दर मोरको देखो, उसका वचन तो अमृतके समान है और आहार साँपका है॥१६१ (ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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