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title: "बालकाण्ड दोहा 159b"
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# बालकाण्ड · दोहा 159b

**चौ०** 
> गै श्रम सकल सुखी नृप भयऊ। निज आश्रम तापस लै गयऊ॥  
> आसन दीन्ह अस्त रबि जानी। पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी॥१॥

भावार्थ: सारी थकावट मिट गयी, राजा सुखी हो गया। तब तपस्वी उसे अपने आश्रममें ले गया और सूर्यास्तका समय जानकर उसने [ राजाको बैठनेके लिये ] आसन दिया। फिर वह तपस्वी कोमल वाणीसे बोला—॥१॥

**चौ०** 
> को तुम्ह कस बन फिरहु अकेलें। सुंदर जुबा जीव परहेलें॥  
> चक्रबर्ति के लच्छन तोरें। देखत दया लागि अति मोरें॥२॥

भावार्थ: तुम कौन हो? सुन्दर युवक होकर, जीवनकी परवा न करके, वनमें अकेले क्यों फिर रहे हो? तुम्हारे चक्रवर्ती राजाके-से लक्षण देखकर मुझे बड़ी दया आती है॥२॥

**चौ०** 
> नाम प्रतापभानु अवनीसा। तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा॥  
> फिरत अहेरें परेउँ भुलाई। बड़ें भाग देखेउँ पद आई॥३॥

भावार्थ: [ राजाने कहा— ] हे मुनीश्वर! सुनिये, प्रतापभानु नामका एक राजा है, मैं उसका मन्त्री हूँ। शिकारके लिये फिरते हुए राह भूल गया हूँ। बड़े भाग्यसे यहाँ आकर मैंने आपके चरणोंके दर्शन पाये हैं॥३॥

**चौ०** 
> हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा। जानत हौं कछु भल होनिहारा॥  
> कह मुनि तात भयउ अँधिआरा। जोजन सत्तरि नगरु तुम्हारा॥ ४॥

भावार्थ: हमें आपका दर्शन दुर्लभ था, इससे जान पड़ता है कुछ भला होनेवाला है। मुनिने कहा— हे तात! अँधेरा हो गया। तुम्हारा नगर यहाँसे सत्तर योजनपर है॥४॥

**दो०** 
> निसा घोर गंभीर बन पंथ न सुनहु सुजान।  
> बसहु आजु अस जानि तुम्ह जाएहु होत बिहान॥१५९ (क)॥

भावार्थ: हे सुजान! सुनो, घोर अँधेरी रात है, घना जंगल है, रास्ता नहीं है, ऐसा समझकर तुम आज यहीं ठहर जाओ, सबेरा होते ही चले जाना॥१५९ (क)॥

**दो०** 
> तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ।  
> आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ॥१५९ (ख)॥

भावार्थ: तुलसीदासजी कहते हैं—जैसी भवितव्यता (होनहार) होती है, वैसी ही सहायता मिल जाती है। या तो वह आप ही उसके पास आती है, या उसको वहाँ ले जाती है॥१५९ (ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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