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title: "बालकाण्ड दोहा 158"
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lang: "hi"
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# बालकाण्ड · दोहा 158

**चौ०** 
> फिरत बिपिन आश्रम एक देखा। तहँ बस नृपति कपट मुनिबेषा॥  
> जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई। समर सेन तजि गयउ पराई॥१॥

भावार्थ: वनमें फिरते-फिरते उसने एक आश्रम देखा; वहाँ कपटसे मुनिका वेष बनाये एक राजा रहता था, जिसका देश राजा प्रतापभानुने छीन लिया था और जो सेनाको छोड़कर युद्धसे भाग गया था॥१॥

**चौ०** 
> समय प्रतापभानु कर जानी। आपन अति असमय अनुमानी॥  
> गयउ न गृह मन बहुत गलानी। मिला न राजहि नृप अभिमानी॥२॥

भावार्थ: प्रतापभानुका समय (अच्छे दिन) जानकर और अपना कुसमय (बुरे दिन) अनुमानकर उसके मनमें बड़ी ग्लानि हुई। इससे वह न तो घर गया और न अभिमानी होनेके कारण राजा प्रतापभानुसे ही मिला (मेल किया)॥२॥

**चौ०** 
> रिस उर मारि रंक जिमि राजा। बिपिन बसइ तापस कें साजा॥  
> तासु समीप गवन नृप कीन्हा। यह प्रतापरबि तेहिं तब चीन्हा॥३॥

भावार्थ: दरिद्रकी भाँति मनहीमें क्रोधको मारकर वह राजा तपस्वीके वेषमें वनमें रहता था। राजा (प्रतापभानु) उसीके पास गया। उसने तुरंत पहचान लिया कि यह प्रतापभानु है॥३॥

**चौ०** 
> राउ तृषित नहिं सो पहिचाना। देखि सुबेष महामुनि जाना॥  
> उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा। परम चतुर न कहेउ निज नामा॥४॥

भावार्थ: राजा प्यासा होनेके कारण [ व्याकुलतामें ] उसे पहचान न सका। सुन्दर वेष देखकर राजाने उसे महामुनि समझा और घोड़ेसे उतरकर उसे प्रणाम किया। परन्तु बड़ा चतुर होनेके कारण राजाने उसे अपना नाम नहीं बतलाया॥४॥

**दो०** 
> भूपति तृषित बिलोकि तेहिं सरबरु दीन्ह देखाइ।  
> मज्जन पान समेत हय कीन्ह नृपति हरषाइ॥१५८॥

भावार्थ: राजाको प्यासा देखकर उसने सरोवर दिखला दिया। हर्षित होकर राजाने घोड़ेसहित उसमें स्नान और जलपान किया॥१५८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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