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title: "बालकाण्ड दोहा 156"
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# बालकाण्ड · दोहा 156

**चौ०** 
> हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना। भूप बिबेकी परम सुजाना॥  
> करइ जे धरम करम मन बानी। बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी॥१॥

भावार्थ: [ राजाके ] हृदयमें किसी फलकी टोह (कामना) न थी। राजा बड़ा ही बुद्धिमान्‌ और ज्ञानी था। वह ज्ञानी राजा कर्म, मन और वाणीसे जो कुछ भी धर्म करता था, सब भगवान्‌ वासुदेवके अर्पित करके करता था॥१॥

**चौ०** 
> चढ़ि बर बाजि बार एक राजा। मृगया कर सब साजि समाजा॥  
> बिंध्याचल गभीर बन गयऊ। मृग पुनीत बहु मारत भयऊ॥२॥

भावार्थ: एक बार वह राजा एक अच्छे घोड़ेपर सवार होकर, शिकारका सब सामान सजाकर विन्ध्याचलके घने जंगलमें गया और वहाँ उसने बहुत-से उत्तम-उत्तम हिरन मारे॥२॥

**चौ०** 
> फिरत बिपिन नृप दीख बराहू। जनु बन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू॥  
> बड़ बिधु नहिं समात मुख माहीं। मनहुँ क्रोध बस उगिलत नाहीं॥३॥

भावार्थ: राजाने वनमें फिरते हुए एक सूअरको देखा। [ दाँतोंके कारण वह ऐसा दीख पड़ता था ] मानो चन्द्रमाको ग्रसकर (मुँहमें पकड़कर) राहु वनमें आ छिपा हो। चन्द्रमा बड़ा होनेसे उसके मुँहमें समाता नहीं है और मानो क्रोधवश वह भी उसे उगलता नहीं है॥३॥

**चौ०** 
> कोल कराल दसन छबि गाई। तनु बिसाल पीवर अधिकाई॥  
> घुरुघुरात हय आरौ पाएँ। चकित बिलोकत कान उठाएँ॥४॥

भावार्थ: यह तो सूअरके भयानक दाँतोंकी शोभा कही गयी। [ इधर ] उसका शरीर भी बहुत विशाल और मोटा था। घोड़ेकी आहट पाकर वह घुरघुराता हुआ कान उठाये चौकन्ना होकर देख रहा था॥४॥

**दो०** 
> नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु।  
> चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु॥१५६॥

भावार्थ: नील पर्वतके शिखरके समान विशाल [ शरीरवाले ] उस सूअरको देखकर राजा घोड़ेको चाबुक लगाकर तेजीसे चला और उसने सूअरको ललकारा कि अब तेरा बचाव नहीं हो सकता॥१५६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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