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title: "बालकाण्ड दोहा 154"
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# बालकाण्ड · दोहा 154

**चौ०** 
> नृप हितकारक सचिव सयाना। नाम धरमरुचि सुक्र समाना॥  
> सचिव सयान बंधु बलबीरा। आपु प्रतापपुंज रनधीरा॥१॥

भावार्थ: राजाका हित करनेवाला और शुक्राचार्यके समान बुद्धिमान्‌ धर्मरुचि नामक उसका मन्त्री था। इस प्रकार बुद्धिमान्‌ मन्त्री और बलवान्‌ तथा वीर भाईके साथ ही स्वयं राजा भी बड़ा प्रतापी और रणधीर था॥१॥

**चौ०** 
> सेन संग चतुरंग अपारा। अमित सुभट सब समर जुझारा॥  
> सेन बिलोकि राउ हरषाना। अरु बाजे गहगहे निसाना॥२॥

भावार्थ: साथमें अपार चतुरङ्गिणी सेना थी, जिसमें असंख्य योद्धा थे, जो सब-के-सब रणमें जूझ मरनेवाले थे। अपनी सेनाको देखकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ और घमाघम नगाड़े बजने लगे॥२॥

**चौ०** 
> बिजय हेतु कटकई बनाई। सुदिन साधि नृप चलेउ बजाई॥  
> जहँ तहँ परीं अनेक लराईं। जीते सकल भूप बरिआईं॥ ३ ॥

भावार्थ: दिग्विजयके लिये सेना सजाकर वह राजा शुभ दिन (मुहूर्त) साधकर और डंका बजाकर चला। जहाँ-तहाँ बहुत-सी लड़ाइयाँ हुईं। उसने सब राजाओंको बलपूर्वक जीत लिया॥३॥

**चौ०** 
> सप्त दीप भुजबल बस कीन्हे। लै लै दंड छाड़ि नृप दीन्हे॥  
> सकल अवनि मंडल तेहि काला। एक प्रतापभानु महिपाला॥४॥

भावार्थ: अपनी भुजाओंके बलसे उसने सातों द्वीपों (भूमिखण्डों) को वशमें कर लिया और राजाओंसे दण्ड (कर) ले-लेकर उन्हें छोड़ दिया। सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डलका उस समय प्रतापभानु ही एकमात्र (चक्रवर्ती) राजा था॥४॥

**दो०** 
> स्वबस बिस्व करि बाहुबल निज पुर कीन्ह प्रबेसु।  
> अरथ धरम कामादि सुख सेवइ समयँ नरेसु॥१५४॥

भावार्थ: संसारभरको अपनी भुजाओंके बलसे वशमें करके राजाने अपने नगरमें प्रवेश किया। राजा अर्थ, धर्म और काम आदिके सुखोंका समयानुसार सेवन करता था॥१५४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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