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title: "बालकाण्ड दोहा 152"
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# बालकाण्ड · दोहा 152

**चौ०** 
> इच्छामय नरबेष सँवारें। होइहउँ प्रगट निकेत तुम्हारें॥  
> अंसन्ह सहित देह धरि ताता। करिहउँ चरित भगत सुखदाता॥१॥

भावार्थ: इच्छानिर्मित मनुष्यरूप सजकर मैं तुम्हारे घर प्रकट होऊँगा। हे तात! मैं अपने अंशोंसहित देह धारण करके भक्तोंको सुख देनेवाले चरित्र करूँगा॥ १ ॥

**चौ०** 
> जे सुनि सादर नर बड़भागी। भव तरिहहिं ममता मद त्यागी॥  
> आदिसक्ति जेहिं जग उपजाया। सोउ अवतरिहि मोरि यह माया॥२॥

भावार्थ: जिन ( चरित्रों ) को बड़े भाग्यशाली मनुष्य आदरसहित सुनकर, ममता और मद त्यागकर, भवसागरसे तर जायँगे। आदिशक्ति यह मेरी [ स्वरूपभूता ] माया भी, जिसने जगत्‌को उत्पन्न किया है, अवतार लेगी॥ २ ॥

**चौ०** 
> पुरउब मैं अभिलाष तुम्हारा। सत्य सत्य पन सत्य हमारा॥  
> पुनि पुनि अस कहि कृपानिधाना। अंतरधान भए भगवाना॥३॥

भावार्थ: इस प्रकार मैं तुम्हारी अभिलाषा पूरी करूँगा। मेरा प्रण सत्य है, सत्य है, सत्य है। कृपानिधान भगवान्‌ बार-बार ऐसा कहकर अन्तर्धान हो गये॥ ३ ॥

**चौ०** 
> दंपति उर धरि भगत कृपाला। तेहिं आश्रम निवसे कछु काला॥  
> समय पाइ तनु तजि अनयासा। जाइ कीन्ह अमरावति बासा॥४॥

भावार्थ: वे स्त्री-पुरुष ( राजा-रानी ) भक्तोंपर कृपा करनेवाले भगवान्‌को हृदयमें धारण करके कुछ कालतक उस आश्रममें रहे। फिर उन्होंने समय पाकर, सहज ही ( बिना किसी कष्टके ) शरीर छोड़कर, अमरावती ( इन्द्रकी पुरी ) में जाकर वास किया॥ ४ ॥

**दो०** 
> यह इतिहास पुनीत अति उमहि कही बृषकेतु।  
> भरद्वाज सुनु अपर पुनि राम जनम कर हेतु॥१५२॥

भावार्थ: [ याज्ञवल्क्यजी कहते हैं— ] हे भरद्वाज! इस अत्यन्त पवित्र इतिहासको शिवजीने पार्वतीसे कहा था। अब श्रीरामके अवतार लेनेका दूसरा कारण सुनो॥ १५२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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