---
title: "बालकाण्ड दोहा 151"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-151"
lang: "hi"
---

# बालकाण्ड · दोहा 151

प्रतापभानुकी कथा

**चौ०** 
> सुनि मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना॥  
> जो कछु रुचि तुम्हरे मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं॥१॥

भावार्थ: [ रानीकी ] कोमल, गूढ़ और मनोहर श्रेष्ठ वाक्यरचना सुनकर कृपाके समुद्र भगवान्‌ कोमल वचन बोले—तुम्हारे मनमें जो कुछ इच्छा है, वह सब मैंने तुमको दिया, इसमें कोई सन्देह न समझना॥ १ ॥

**चौ०** 
> मातु बिबेक अलौकिक तोरें। कबहुँ न मिटिहि अनुग्रह मोरें॥  
> बंदि चरन मनु कहेउ बहोरी। अवर एक बिनती प्रभु मोरी॥२॥

भावार्थ: हे माता! मेरी कृपासे तुम्हारा अलौकिक ज्ञान कभी नष्ट न होगा। तब मनुने भगवान्‌के चरणोंकी वन्दना करके फिर कहा—हे प्रभु! मेरी एक विनती और है—॥ २ ॥

**चौ०** 
> सुत बिषइक तव पद रति होऊ। मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ॥  
> मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना। मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना॥३॥

भावार्थ: आपके चरणोंमें मेरी वैसी ही प्रीति हो जैसी पुत्रके लिये पिताकी होती है, चाहे मुझे कोई बड़ा भारी मूर्ख ही क्यों न कहे। जैसे मणिके बिना साँप और जलके बिना मछली [ नहीं रह सकती ], वैसे ही मेरा जीवन आपके अधीन रहे ( आपके बिना न रह सके )॥ ३ ॥

**चौ०** 
> अस बरु मागि चरन गहि रहेऊ। एवमस्तु करुनानिधि कहेऊ॥  
> अब तुम्ह मम अनुसासन मानी। बसहु जाइ सुरपति रजधानी॥४॥

भावार्थ: ऐसा वर माँगकर राजा भगवान्‌के चरण पकड़े रह गये। तब दयाके निधान भगवान्‌ने कहा—ऐसा ही हो। अब तुम मेरी आज्ञा मानकर देवराज इन्द्रकी राजधानी ( अमरावती ) में जाकर वास करो॥ ४ ॥

**सो०** 
> तहँ करि भोग बिसाल तात गएँ कछु काल पुनि।  
> होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत॥१५१॥

भावार्थ: हे तात! वहाँ [ स्वर्गके ] बहुत-से भोग भोगकर, कुछ काल बीत जानेपर, तुम अवधके राजा होगे। तब मैं तुम्हारा पुत्र होऊँगा॥ १५१ ॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-150  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-152

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
