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title: "बालकाण्ड दोहा 150"
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# बालकाण्ड · दोहा 150

**चौ०** 
> देखि प्रीति सुनि बचन अमोले। एवमस्तु करुनानिधि बोले॥  
> आपु सरिस खोजौं कहँ जाई। नृप तव तनय होब मैं आई॥१॥

भावार्थ: राजाकी प्रीति देखकर और उनके अमूल्य वचन सुनकर करुणानिधान भगवान्‌ बोले—ऐसा ही हो। हे राजन्‌! मैं अपने समान [ दूसरा ] कहाँ जाकर खोजूँ। अतः स्वयं ही आकर तुम्हारा पुत्र बनूँगा॥ १ ॥

**चौ०** 
> सतरूपहि बिलोकि कर जोरें। देबि मागु बरु जो रुचि तोरें॥  
> जो बरु नाथ चतुर नृप मागा। सोइ कृपाल मोहि अति प्रिय लागा॥२॥

भावार्थ: शतरूपाजीको हाथ जोड़े देखकर भगवान्‌ने कहा—हे देवि! तुम्हारी जो इच्छा हो, सो वर माँग लो। [ शतरूपाने कहा— ] हे नाथ! चतुर राजाने जो वर माँगा, हे कृपालु! वह मुझे बहुत ही प्रिय लगा॥ २ ॥

**चौ०** 
> प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई। जदपि भगत हित तुम्हहि सोहाई॥  
> तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी। ब्रह्म सकल उर अंतरजामी॥३॥

भावार्थ: परन्तु हे प्रभु! बहुत ढिठाई हो रही है, यद्यपि हे भक्तोंका हित करनेवाले! वह ढिठाई भी आपको अच्छी ही लगती है। आप ब्रह्मा आदिके भी पिता ( उत्पन्न करनेवाले ), जगत्‌के स्वामी और सबके हृदयके भीतरकी जाननेवाले ब्रह्म हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> अस समुझत मन संसय होई। कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई॥  
> जे निज भगत नाथ तव अहहीं। जो सुख पावहिं जो गति लहहीं॥४॥

भावार्थ: ऐसा समझनेपर मनमें सन्देह होता है, फिर भी प्रभुने जो कहा वही प्रमाण ( सत्य ) है। [ मैं तो यह माँगती हूँ कि ] हे नाथ! आपके जो निज जन हैं वे जो ( अलौकिक, अखण्ड ) सुख पाते हैं और जिस परम गतिको प्राप्त होते हैं॥ ४ ॥

**दो०** 
> सोइ सुख सोइ गति सोइ भगति सोइ निज चरन सनेहु।  
> सोइ बिबेक सोइ रहनि प्रभु हमहि कृपा करि देहु॥१५०॥

भावार्थ: हे प्रभो! वही सुख, वही गति, वही भक्ति, वही अपने चरणोंमें प्रेम, वही ज्ञान और वही रहन-सहन कृपा करके हमें दीजिये॥ १५० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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