---
title: "बालकाण्ड दोहा 14g"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-14g"
lang: "hi"
---

# बालकाण्ड · दोहा 14g

वाल्मीकि, वेद, ब्रह्मा, देवता, शिव, पार्वती आदिकी वन्दना

**चौ०** 
> एहि प्रकार बल मनहि देखाई। करिहउँ रघुपति कथा सुहाई॥  
> ब्यास आदि कबि पुंगव नाना। जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना॥१॥

भावार्थ: इस प्रकार मनको बल दिखलाकर मैं श्रीरघुनाथजीकी सुहावनी कथाकी रचना करूँगा। व्यास आदि जो अनेकों श्रेष्ठ कवि हो गये हैं, जिन्होंने बड़े आदरसे श्रीहरिका सुयश वर्णन किया है॥१॥

**चौ०** 
> चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे। पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे॥  
> कलि के कबिन्ह करउँ परनामा। जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा॥२॥

भावार्थ: मैं उन सब ( श्रेष्ठ कवियों ) के चरणकमलोंमें प्रणाम करता हूँ, वे मेरे सब मनोरथोंको पूरा करें। कलियुगके भी उन कवियोंको मैं प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने श्रीरघुनाथजीके गुणसमूहोंका वर्णन किया है॥२॥

**चौ०** 
> जे प्राकृत कबि परम सयाने। भाषाँ जिन्ह हरि चरित बखाने॥  
> भए जे अहहिं जे होइहहिं आगें। प्रनवउँ सबहि कपट सब त्यागें॥३॥

भावार्थ: जो बड़े बुद्धिमान्‌ प्राकृत कवि हैं, जिन्होंने भाषामें हरिचरित्रोंका वर्णन किया है, जो ऐसे कवि पहले हो चुके हैं, जो इस समय वर्तमान हैं और जो आगे होंगे, उन सबको मैं सारा कपट त्यागकर प्रणाम करता हूँ॥३॥

**चौ०** 
> होहु प्रसन्न देहु बरदानू। साधु समाज भनिति सनमानू॥  
> जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं। सो श्रम बादि बाल कबि करहीं॥४॥

भावार्थ: आप सब प्रसन्न होकर यह वरदान दीजिये कि साधु-समाजमें मेरी कविताका सम्मान हो; क्योंकि बुद्धिमान्‌ लोग जिस कविताका आदर नहीं करते, मूर्ख कवि ही उसकी रचनाका व्यर्थ परिश्रम करते हैं॥४॥

**चौ०** 
> कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥  
> राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अँदेसा॥५॥

भावार्थ: कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है जो गङ्गाजीकी तरह सबका हित करनेवाली हो। श्रीरामचन्द्रजीकी कीर्ति तो बड़ी सुन्दर ( सबका अनन्त कल्याण करनेवाली ही ) है, परन्तु मेरी कविता भद्दी है। यह असामञ्जस्य है ( अर्थात्‌ इन दोनोंका मेल नहीं मिलता ), इसीकी मुझे चिन्ता है॥५॥

**चौ०** 
> तुम्हरी कृपाँ सुलभ सोउ मोरे। सिअनि सुहावनि टाट पटोरे॥६॥

भावार्थ: परन्तु हे कवियो! आपकी कृपासे यह बात भी मेरे लिये सुलभ हो सकती है। रेशमकी सिलाई टाटपर भी सुहावनी लगती है॥६॥

**दो०** 
> सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान।  
> सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान॥१४(क)॥

भावार्थ: चतुर पुरुष उसी कविताका आदर करते हैं, जो सरल हो और जिसमें निर्मल चरित्रका वर्णन हो तथा जिसे सुनकर शत्रु भी स्वाभाविक वैरको भूलकर सराहना करने लगें॥१४ (क)॥

**दो०** 
> सो न होइ बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर।  
> करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि पुनि करउँ निहोर॥१४(ख)॥

भावार्थ: ऐसी कविता बिना निर्मल बुद्धिके होती नहीं और मेरे बुद्धिका बल बहुत ही थोड़ा है। इसलिये बार-बार निहोरा करता हूँ कि हे कवियो! आप कृपा करें, जिससे मैं हरियशका वर्णन कर सकूँ॥१४ (ख)॥

**दो०** 
> कबि कोबिद रघुबर चरित मानस मंजु मराल।  
> बालबिनय सुनि सुरुचि लखि मो पर होहु कृपाल॥१४(ग)॥

भावार्थ: कवि और पण्डितगण! आप जो रामचरित्ररूपी मानसरोवरके सुन्दर हंस हैं, मुझ बालककी विनती सुनकर और सुन्दर रुचि देखकर मुझपर कृपा करें॥१४ (ग)॥

**सो०** 
> बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ।  
> सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित॥१४(घ)॥

भावार्थ: मैं उन वाल्मीकि मुनिके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ, जिन्होंने रामायणकी रचना की है, जो खर ( राक्षस ) सहित होनेपर भी खर ( कठोर ) से विपरीत बड़ी कोमल और सुन्दर है तथा जो दूषण ( राक्षस ) सहित होनेपर भी दूषण अर्थात्‌ दोषसे रहित है॥१४ (घ)॥

**सो०** 
> बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस।  
> जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद जसु॥१४(ङ)॥

भावार्थ: मैं चारों वेदोंकी वन्दना करता हूँ, जो संसारसमुद्रके पार होनेके लिये जहाजके समान हैं तथा जिन्हें श्रीरघुनाथजीका निर्मल यश वर्णन करते स्वप्नमें भी खेद ( थकावट ) नहीं होता॥१४ (ङ)॥

**सो०** 
> बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहिं कीन्ह जहँ।  
> संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारुनी॥१४(च)॥

भावार्थ: मैं ब्रह्माजीके चरण-रजकी वन्दना करता हूँ, जिन्होंने भवसागर बनाया है, जहाँसे एक ओर संतरूपी अमृत, चन्द्रमा और कामधेनु निकले और दूसरी ओर दुष्ट मनुष्यरूपी विष और मदिरा उत्पन्न हुए॥१४ (च)॥

**दो०** 
> बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरन बंदि कहउँ कर जोरि।  
> होइ प्रसन्न पुरवहु सकल मंजु मनोरथ मोरि॥१४(छ)॥

भावार्थ: देवता, ब्राह्मण, पण्डित, ग्रह—इन सबके चरणोंकी वन्दना करके हाथ जोड़कर कहता हूँ कि आप प्रसन्न होकर मेरे सारे सुन्दर मनोरथोंको पूरा करें॥१४ (छ)॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-13  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-15

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
