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title: "बालकाण्ड दोहा 149"
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# बालकाण्ड · दोहा 149

**चौ०** 
> सुनि प्रभु बचन जोरि जुग पानी। धरि धीरजु बोली मृदु बानी॥  
> नाथ देखि पद कमल तुम्हारे। अब पूरे सब काम हमारे॥१॥

भावार्थ: प्रभुके वचन सुनकर, दोनों हाथ जोड़कर और धीरज धरकर राजाने कोमल वाणी कही—हे नाथ! आपके चरणकमलोंको देखकर अब हमारी सारी मनःकामनाएँ पूरी हो गयीं॥ १ ॥

**चौ०** 
> एक लालसा बड़ि उर माहीं। सुगम अगम कहि जाति सो नाहीं॥  
> तुम्हहि देत अति सुगम गोसाईं। अगम लाग मोहि निज कृपनाईं॥२॥

भावार्थ: फिर भी मनमें एक बड़ी लालसा है। उसका पूरा होना सहज भी है और अत्यन्त कठिन भी, इसीसे उसे कहते नहीं बनता। हे स्वामी! आपके लिये तो उसका पूरा करना बहुत सहज है, पर मुझे अपनी कृपणता ( दीनता ) के कारण वह अत्यन्त कठिन मालूम होता है॥ २ ॥

**चौ०** 
> जथा दरिद्र बिबुधतरु पाई। बहु संपति मागत सकुचाई॥  
> तासु प्रभाउ जान नहिं सोई। तथा हृदयँ मम संसय होई॥३॥

भावार्थ: जैसे कोई दरिद्र कल्पवृक्षको पाकर भी अधिक द्रव्य माँगनेमें संकोच करता है, क्योंकि वह उसके प्रभावको नहीं जानता, वैसे ही मेरे हृदयमें संशय हो रहा है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> सो तुम्ह जानहु अंतरजामी। पुरवहु मोर मनोरथ स्वामी॥  
> सकुच बिहाइ मागु नृप मोही। मोरें नहिं अदेय कछु तोही॥४॥

भावार्थ: हे स्वामी! आप अन्तर्यामी हैं, इसलिये उसे जानते ही हैं। मेरा वह मनोरथ पूरा कीजिये। [ भगवान्‌ने कहा— ] हे राजन्‌! संकोच छोड़कर मुझसे माँगो। तुम्हें न दे सकूँ ऐसा मेरे पास कुछ भी नहीं है॥ ४ ॥

**दो०** 
> दानि सिरोमनि कृपानिधि नाथ कहउँ सतिभाउ।  
> चाहउँ तुम्हहि समान सुत प्रभु सन कवन दुराउ॥१४९॥

भावार्थ: [ राजाने कहा— ] हे दानियोंके शिरोमणि! हे कृपानिधान! हे नाथ! मैं अपने मनका सच्चा भाव कहता हूँ कि मैं आपके समान पुत्र चाहता हूँ। प्रभुसे भला क्या छिपाना!॥ १४९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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