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title: "बालकाण्ड दोहा 148"
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# बालकाण्ड · दोहा 148

**चौ०** 
> पद राजीव बरनि नहिं जाहीं। मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं॥  
> बाम भाग सोभति अनुकूला। आदिसक्ति छबिनिधि जगमूला॥१॥

भावार्थ: जिनमें मुनियोंके मनरूपी भौंरे बसते हैं, भगवान्‌के उन चरणकमलोंका तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। भगवान्‌के बायें भागमें सदा अनुकूल रहनेवाली, शोभाकी राशि, जगत्‌की मूलकारणरूपा आदिशक्ति श्रीजानकीजी सुशोभित हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> जासु अंस उपजहिं गुनखानी। अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी॥  
> भृकुटि बिलास जासु जग होई। राम बाम दिसि सीता सोई॥२॥

भावार्थ: जिनके अंशसे गुणोंकी खान अगणित लक्ष्मी, पार्वती और ब्रह्माणी ( त्रिदेवोंकी शक्तियाँ ) उत्पन्न होती हैं तथा जिनकी भौंहके इशारेसे ही जगत्‌की रचना हो जाती है, वही [ भगवान्‌की स्वरूपा-शक्ति ] श्रीसीताजी श्रीरामचन्द्रजीकी बायीं ओर स्थित हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> छबिसमुद्र हरि रूप बिलोकी। एकटक रहे नयन पट रोकी॥  
> चितवहिं सादर रूप अनूपा। तृप्ति न मानहिं मनु सतरूपा॥३॥

भावार्थ: शोभाके समुद्र श्रीहरिके रूपको देखकर मनु-शतरूपा नेत्रोंके पट ( पलकें ) रोके हुए एकटक ( स्तब्ध ) रह गये। उस अनुपम रूपको वे आदरसहित देख रहे थे और देखते-देखते अघाते ही न थे॥ ३ ॥

**चौ०** 
> हरष बिबस तन दसा भुलानी। परे दंड इव गहि पद पानी॥  
> सिर परसे प्रभु निज कर कंजा। तुरत उठाए करुनापुंजा॥४॥

भावार्थ: आनन्दके अधिक वशमें हो जानेके कारण उन्हें अपने देहकी सुधि भूल गयी। वे हाथोंसे भगवान्‌के चरण पकड़कर दण्डकी तरह ( सीधे ) भूमिपर गिर पड़े। कृपाकी राशि प्रभुने अपने करकमलोंसे उनके मस्तकोंका स्पर्श किया और उन्हें तुरंत ही उठा लिया॥ ४ ॥

**दो०** 
> बोले कृपानिधान पुनि अति प्रसन्न मोहि जानि।  
> मागहु बर जोइ भाव मन महादानि अनुमानि॥१४८॥

भावार्थ: फिर कृपानिधान भगवान्‌ बोले—मुझे अत्यन्त प्रसन्न जानकर और बड़ा भारी दानी मानकर, जो मनको भाये वही वर माँग लो॥ १४८ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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