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title: "बालकाण्ड दोहा 147"
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# बालकाण्ड · दोहा 147

**चौ०** 
> सरद मयंक बदन छबि सींवा। चारु कपोल चिबुक दर ग्रीवा॥  
> अधर अरुन रद सुंदर नासा। बिधु कर निकर बिनिंदक हासा॥१॥

भावार्थ: उनका मुख शरद् [ पूर्णिमा ] के चन्द्रमाके समान छविकी सीमास्वरूप था। गाल और ठोड़ी बहुत सुन्दर थे, गला शङ्खके समान ( त्रिरेखायुक्त, चढ़ाव-उतारवाला ) था। लाल ओठ, दाँत और नाक अत्यन्त सुन्दर थे। हँसी चन्द्रमाकी किरणावलीको नीचा दिखानेवाली थी॥ १ ॥

**चौ०** 
> नव अंबुज अंबक छबि नीकी। चितवनि ललित भावँती जी की॥  
> भृकुटि मनोज चाप छबि हारी। तिलक ललाट पटल दुतिकारी॥२॥

भावार्थ: नेत्रोंकी छबि नये [ खिले हुए ] कमलके समान बड़ी सुन्दर थी। मनोहर चितवन जीको बहुत प्यारी लगती थी। टेढ़ी भौंहें कामदेवके धनुषकी शोभाको हरनेवाली थीं। ललाटपटलपर प्रकाशमय तिलक था॥ २ ॥

**चौ०** 
> कुंडल मकर मुकुट सिर भ्राजा। कुटिल केस जनु मधुप समाजा॥  
> उर श्रीबत्स रुचिर बनमाला। पदिक हार भूषन मनिजाला॥३॥

भावार्थ: कानोंमें मकराकृत ( मछलीके आकारके ) कुण्डल और सिरपर मुकुट सुशोभित था। टेढ़े ( घुँघराले ) काले बाल ऐसे सघन थे, मानो भौंरोंके झुंड हों। हृदयपर श्रीवत्स, सुन्दर वनमाला, रत्नजटित हार और मणियोंके आभूषण सुशोभित थे॥ ३ ॥

**चौ०** 
> केहरि कंधर चारु जनेऊ। बाहु बिभूषन सुंदर तेऊ॥  
> करि कर सरिस सुभग भुजदंडा। कटि निषंग कर सर कोदंडा॥४॥

भावार्थ: सिंहकी-सी गर्दन थी, सुन्दर जनेऊ था। भुजाओंमें जो गहने थे, वे भी सुन्दर थे। हाथीकी सूँड़के समान ( उतार-चढ़ाववाले ) सुन्दर भुजदण्ड थे। कमरमें तरकस और हाथमें बाण और धनुष [ शोभा पा रहे ] थे॥ ४ ॥

**दो०** 
> तड़ित बिनिंदक पीत पट उदर रेख बर तीनि।  
> नाभि मनोहर लेति जनु जमुन भवँर छबि छीनि॥ १४७ ॥

भावार्थ: [ स्वर्ण-वर्णका प्रकाशमय ] पीताम्बर बिजलीको लजानेवाला था। पेटपर सुन्दर तीन रेखाएँ ( त्रिवली ) थीं। नाभि ऐसी मनोहर थी, मानो यमुनाजीके भँवरोंकी छबिको छीने लेती हो॥ १४७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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