---
title: "बालकाण्ड दोहा 144"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-144"
lang: "hi"
---

# बालकाण्ड · दोहा 144

**चौ०** 
> करहिं अहार साक फल कंदा। सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा॥  
> पुनि हरि हेतु करन तप लागे। बारि अधार मूल फल त्यागे॥१॥

भावार्थ: वे साग, फल और कन्दका आहार करते थे और सच्चिदानन्द ब्रह्मका स्मरण करते थे। फिर वे श्रीहरिके लिये तप करने लगे और मूल-फलको त्यागकर केवल जलके आधारपर रहने लगे॥१॥

**चौ०** 
> उर अभिलाष निरंतर होई। देखिअ नयन परम प्रभु सोई॥  
> अगुन अखंड अनंत अनादी। जेहि चिंतहिं परमारथबादी॥२॥

भावार्थ: हृदयमें निरन्तर यही अभिलाषा हुआ करती कि हम [ कैसे ] उन परम प्रभुको आँखोंसे देखें, जो निर्गुण, अखण्ड, अनन्त और अनादि हैं और परमार्थवादी ( ब्रह्मज्ञानी, तत्त्ववेत्ता ) लोग जिनका चिन्तन किया करते हैं॥२॥

**चौ०** 
> नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद निरुपाधि अनूपा॥  
> संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना॥३॥

भावार्थ: जिन्हें वेद ‘नेति-नेति’ ( यह भी नहीं, यह भी नहीं ) कहकर निरूपण करते हैं। जो आनन्दस्वरूप, उपाधिरहित और अनुपम हैं, एवं जिनके अंशसे अनेकों शिव, ब्रह्मा और विष्णुभगवान्‌ प्रकट होते हैं॥३॥

**चौ०** 
> ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई। भगत हेतु लीलातनु गहई॥  
> जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा। तौ हमार पूजिहि अभिलाषा॥४॥

भावार्थ: ऐसे [ महान्‌ ] प्रभु भी सेवकके वशमें हैं और भक्तोंके लिये [ दिव्य ] लीलाविग्रह धारण करते हैं। यदि वेदोंमें यह वचन सत्य कहा है तो हमारी अभिलाषा भी अवश्य पूरी होगी॥४॥

**दो०** 
> एहि बिधि बीते बरष षट सहस बारि आहार।  
> संबत सप्त सहस्र पुनि रहे समीर अधार॥१४४॥

भावार्थ: इस प्रकार जलका आहार [ करके तप ] करते छः हजार वर्ष बीत गये। फिर सात हजार वर्ष वे वायुके आधारपर रहे॥१४४॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-143  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-145

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
