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title: "बालकाण्ड दोहा 142"
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# बालकाण्ड · दोहा 142

**चौ०** 
> स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा॥  
> दंपति धरम आचरन नीका। अजहुँ गाव श्रुति जिन्ह कै लीका॥१॥

भावार्थ: स्वायम्भुव मनु और [ उनकी पत्नी ] शतरूपा, जिनसे मनुष्योंकी यह अनुपम सृष्टि हुई, इन दोनों पति-पत्नीके धर्म और आचरण बहुत अच्छे थे। आज भी वेद जिनकी मर्यादाका गान करते हैं॥१॥

**चौ०** 
> नृप उत्तानपाद सुत तासू। ध्रुव हरिभगत भयउ सुत जासू॥  
> लघु सुत नाम प्रियब्रत ताही। बेद पुरान प्रसंसहिं जाही॥२॥

भावार्थ: राजा उत्तानपाद उनके पुत्र थे, जिनके पुत्र [ प्रसिद्ध ] हरिभक्त ध्रुवजी हुए। उन ( मनुजी ) के छोटे लड़केका नाम प्रियव्रत था, जिसकी प्रशंसा वेद और पुराण करते हैं॥२॥

**चौ०** 
> देवहूति पुनि तासु कुमारी। जो मुनि कर्दम कै प्रिय नारी॥  
> आदिदेव प्रभु दीनदयाला। जठर धरेउ जेहिं कपिल कृपाला॥३॥

भावार्थ: पुनः देवहूति उनकी कन्या थी, जो कर्दम मुनिकी प्यारी पत्नी हुई और जिन्होंने आदिदेव, दीनोंपर दया करनेवाले समर्थ एवं कृपालु भगवान्‌ कपिलको गर्भमें धारण किया॥३॥

**चौ०** 
> सांख्य सास्त्र जिन्ह प्रगट बखाना। तत्त्व बिचार निपुन भगवाना॥  
> तेहिं मनु राज कीन्ह बहु काला। प्रभु आयसु सब बिधि प्रतिपाला॥४॥

भावार्थ: तत्त्वोंका विचार करनेमें अत्यन्त निपुण जिन ( कपिल ) भगवान्‌ने सांख्यशास्त्रका प्रकटरूपमें वर्णन किया, उन ( स्वायम्भुव ) मनुजीने बहुत समयतक राज्य किया और सब प्रकारसे भगवान्‌की आज्ञा [ रूप शास्त्रोंकी मर्यादा ] का पालन किया॥४॥

**सो०** 
> होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन।  
> हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु॥१४२॥

भावार्थ: घरमें रहते बुढ़ापा आ गया, परन्तु विषयोंसे वैराग्य नहीं होता; [ इस बातको सोचकर ] उनके मनमें बड़ा दुःख हुआ कि श्रीहरिकी भक्ति बिना जन्म यों ही चला गया॥१४२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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