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title: "बालकाण्ड दोहा 139"
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# बालकाण्ड · दोहा 139

**चौ०** 
> हर गन मुनिहि जात पथ देखी। बिगत मोह मन हरष बिसेषी॥  
> अति सभीत नारद पहिं आए। गहि पद आरत बचन सुनाए॥१॥

भावार्थ: शिवजीके गणोंने जब मुनिको मोहरहित और मनमें बहुत प्रसन्न होकर मार्गमें जाते हुए देखा तब वे अत्यन्त भयभीत होकर नारदजीके पास आये और उनके चरण पकड़कर दीन वचन बोले—॥१॥

**चौ०** 
> हर गन हम न बिप्र मुनिराया। बड़ अपराध कीन्ह फल पाया॥  
> श्राप अनुग्रह करहु कृपाला। बोले नारद दीनदयाला॥२॥

भावार्थ: हे मुनिराज! हम ब्राह्मण नहीं हैं, शिवजीके गण हैं। हमने बड़ा अपराध किया, जिसका फल हमने पा लिया। हे कृपालु! अब शाप दूर करनेकी कृपा कीजिये। दीनोंपर दया करनेवाले नारदजीने कहा—॥२॥

**चौ०** 
> निसिचर जाइ होहु तुम्ह दोऊ। बैभव बिपुल तेज बल होऊ॥  
> भुज बल बिस्व जितब तुम्ह जहिआ। धरिहहिं बिष्नु मनुज तनु तहिआ॥३॥

भावार्थ: तुम दोनों जाकर राक्षस होओ; तुम्हें महान्‌ ऐश्वर्य, तेज और बलकी प्राप्ति हो। तुम अपनी भुजाओंके बलसे जब सारे विश्वको जीत लोगे, तब भगवान्‌ विष्णु मनुष्यका शरीर धारण करेंगे॥३॥

**चौ०** 
> समर मरन हरि हाथ तुम्हारा। होइहहु मुकुत न पुनि संसारा॥  
> चले जुगल मुनि पद सिर नाई। भए निसाचर कालहि पाई॥४॥

भावार्थ: युद्धमें श्रीहरिके हाथसे तुम्हारी मृत्यु होगी, जिससे तुम मुक्त हो जाओगे और फिर संसारमें जन्म नहीं लोगे। वे दोनों मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर चले और समय पाकर राक्षस हुए॥४॥

**दो०** 
> एक कलप एहि हेतु प्रभु लीन्ह मनुज अवतार।  
> सुर रंजन सज्जन सुखद हरि भंजन भुबि भार॥१३९॥

भावार्थ: देवताओंको प्रसन्न करनेवाले, सज्जनोंको सुख देनेवाले और पृथ्वीका भार हरण करनेवाले भगवान्‌ने एक कल्पमें इसी कारण मनुष्यका अवतार लिया था॥१३९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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