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title: "बालकाण्ड दोहा 138"
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# बालकाण्ड · दोहा 138

**चौ०** 
> जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी॥  
> तब मुनि अति सभीत हरि चरना। गहे पाहि प्रनतारति हरना॥१॥

भावार्थ: जब भगवान्‌ने अपनी मायाको हटा लिया, तब वहाँ न लक्ष्मी ही रह गयीं, न राजकुमारी ही। तब मुनिने अत्यन्त भयभीत होकर श्रीहरिके चरण पकड़ लिये और कहा—हे शरणागतके दुःखोंको हरनेवाले! मेरी रक्षा कीजिये॥१॥

**चौ०** 
> मृषा होउ मम श्राप कृपाला। मम इच्छा कह दीनदयाला॥  
> मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे। कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे॥२॥

भावार्थ: हे कृपालु! मेरा शाप मिथ्या हो जाय। तब दीनोंपर दया करनेवाले भगवान्‌ने कहा कि यह सब मेरी ही इच्छा [ से हुआ ] है। मुनिने कहा—मैंने आपको अनेक खोटे वचन कहे हैं। मेरे पाप कैसे मिटेंगे?॥२॥

**चौ०** 
> जपहु जाइ संकर सत नामा। होइहि हृदयँ तुरत बिश्रामा॥  
> कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें। असि परतीति तजहु जनि भोरें॥३॥

भावार्थ: [ भगवान्‌ने कहा— ] जाकर शङ्करजीके शतनामका जप करो, इससे हृदयमें तुरंत शान्ति होगी। शिवजीके समान मुझे कोई प्रिय नहीं है, इस विश्वासको भूलकर भी न छोड़ना॥३॥

**चौ०** 
> जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी॥  
> अस उर धरि महि बिचरहु जाई। अब न तुम्हहि माया निअराई॥४॥

भावार्थ: हे मुनि! पुरारि ( शिवजी ) जिसपर कृपा नहीं करते, वह मेरी भक्ति नहीं पाता। हृदयमें ऐसा निश्चय करके जाकर पृथ्वीपर विचरो। अब मेरी माया तुम्हारे निकट नहीं आवेगी॥४॥

**दो०** 
> बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान।  
> सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान॥१३८॥

भावार्थ: बहुत प्रकारसे मुनिको समझा-बुझाकर ( ढाढ़स देकर ) तब प्रभु अन्तर्धान हो गये और नारदजी श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका गान करते हुए सत्यलोक ( ब्रह्मलोक ) को चले॥१३८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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