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title: "बालकाण्ड दोहा 136"
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# बालकाण्ड · दोहा 136

**चौ०** 
> पुनि जल दीख रूप निज पावा। तदपि हृदयँ संतोष न आवा॥  
> फरकत अधर कोप मन माहीं। सपदि चले कमलापति पाहीं॥१॥

भावार्थ: मुनिने फिर जलमें देखा, तो उन्हें अपना (असली) रूप प्राप्त हो गया; तब भी उन्हें सन्तोष नहीं हुआ। उनके ओंठ फड़क रहे थे और मनमें क्रोध [भरा] था। तुरंत ही वे भगवान्‌ कमलापतिके पास चले॥१॥

**चौ०** 
> देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई। जगत मोरि उपहास कराई॥  
> बीचहिं पंथ मिले दनुजारी। संग रमा सोइ राजकुमारी॥२॥

भावार्थ: [मनमें सोचते जाते थे—] जाकर या तो शाप दूँगा या प्राण दे दूँगा। उन्होंने जगत्‌में मेरी हँसी करायी। दैत्योंके शत्रु भगवान्‌ हरि उन्हें बीच रास्तेमें ही मिल गये। साथमें लक्ष्मीजी और वही राजकुमारी थीं॥२॥

**चौ०** 
> बोले मधुर बचन सुरसाईं। मुनि कहँ चले बिकल की नाईं॥  
> सुनत बचन उपजा अति क्रोधा। माया बस न रहा मन बोधा॥३॥

भावार्थ: देवताओंके स्वामी भगवान्‌ने मीठी वाणीमें कहा—हे मुनि! व्याकुलकी तरह कहाँ चले ? ये शब्द सुनते ही नारदको बड़ा क्रोध आया; मायाके वशीभूत होनेके कारण मनमें चेत नहीं रहा॥३॥

**चौ०** 
> पर संपदा सकहु नहिं देखी। तुम्हरें इरिषा कपट बिसेषी॥  
> मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु। सुरन्ह प्रेरि बिष पान करायहु॥४॥

भावार्थ: [ मुनिने कहा— ] तुम दूसरोंकी सम्पदा नहीं देख सकते, तुम्हारे ईर्ष्या और कपट बहुत है। समुद्र मथते समय तुमने शिवजीको बावला बना दिया और देवताओंको प्रेरित करके उन्हें विषपान कराया॥४॥

**दो०** 
> असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारु।  
> स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु॥१३६॥

भावार्थ: असुरोंको मदिरा और शिवजीको विष देकर तुमने स्वयं लक्ष्मी और सुन्दर [ कौस्तुभ ] मणि ले ली। तुम बड़े धोखेबाज और मतलबी हो। सदा कपटका व्यवहार करते हो॥१३६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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