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title: "बालकाण्ड दोहा 135"
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# बालकाण्ड · दोहा 135

**चौ०** 
> जेहि दिसि बैठे नारद फूली। सो दिसि तेहिं न बिलोकी भूली॥  
> पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं। देखि दसा हर गन मुसुकाहीं॥१॥

भावार्थ: जिस ओर नारदजी [रूपके गर्वमें] फूले बैठे थे, उस ओर उसने भूलकर भी नहीं ताका। नारद मुनि बार-बार उचकते और छटपटाते हैं। उनकी दशा देखकर शिवजीके गण मुसकराते हैं॥१॥

**चौ०** 
> धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला। कुअँरि हरषि मेलेउ जयमाला॥  
> दुलहिनि लै गे लच्छिनिवासा। नृपसमाज सब भयउ निरासा॥२॥

भावार्थ: कृपालु भगवान्‌ भी राजाका शरीर धारण कर वहाँ जा पहुँचे। राजकुमारीने हर्षित होकर उनके गलेमें जयमाला डाल दी। लक्ष्मीनिवास भगवान्‌ दुलहिनको ले गये। सारी राजमण्डली निराश हो गयी॥२॥

**चौ०** 
> मुनि अति बिकल मोहँ मति नाठी। मनि गिरि गई छूटि जनु गाँठी॥  
> तब हर गन बोले मुसुकाई। निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई॥३॥

भावार्थ: मोहके कारण मुनिकी बुद्धि नष्ट हो गयी थी, इससे वे [राजकुमारीको गयी देख] बहुत ही विकल हो गये। मानो गाँठसे छूटकर मणि गिर गयी हो। तब शिवजीके गणोंने मुसकराकर कहा—जाकर दर्पणमें अपना मुँह तो देखिये!॥३॥

**चौ०** 
> अस कहि दोउ भागे भयँ भारी। बदन दीख मुनि बारि निहारी॥  
> बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा। तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा॥४॥

भावार्थ: ऐसा कहकर वे दोनों बहुत भयभीत होकर भागे। मुनिने जलमें झाँककर अपना मुँह देखा। अपना रूप देखकर उनका क्रोध बहुत बढ़ गया। उन्होंने शिवजीके उन गणोंको अत्यन्त कठोर शाप दिया॥४॥

**दो०** 
> होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोउ।  
> हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ॥१३५॥

भावार्थ: तुम दोनों कपटी और पापी जाकर राक्षस हो जाओ। तुमने हमारी हँसी की, उसका फल चखो। अब फिर किसी मुनिकी हँसी करना॥१३५॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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