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title: "बालकाण्ड दोहा 133"
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# बालकाण्ड · दोहा 133

**चौ०** 
> कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी॥  
> एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ॥ १ ॥

भावार्थ: हे योगी मुनि! सुनिये, रोगसे व्याकुल रोगी कुपथ्य माँगे तो वैद्य उसे नहीं देता। इसी प्रकार मैंने भी तुम्हारा हित करनेकी ठान ली है। ऐसा कहकर भगवान्‌ अन्तर्धान हो गये॥१॥

**चौ०** 
> माया बिबस भए मुनि मूढ़ा। समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा॥  
> गवने तुरत तहाँ रिषिराई। जहाँ स्वयंबर भूमि बनाई॥२॥

भावार्थ: [भगवान्‌की] मायाके वशीभूत हुए मुनि ऐसे मूढ़ हो गये कि वे भगवान्‌की अगूढ़ (स्पष्ट) वाणीको भी न समझ सके। ऋषिराज नारदजी तुरंत वहाँ गये जहाँ स्वयंवरकी भूमि बनायी गयी थी॥२॥

**चौ०** 
> निज निज आसन बैठे राजा। बहु बनाव करि सहित समाजा॥  
> मुनि मन हरष रूप अति मोरें। मोहि तजि आनहि बरिहि न भोरें॥३॥

भावार्थ: राजालोग खूब सज-धजकर समाजसहित अपने-अपने आसनपर बैठे थे। मुनि (नारद) मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे थे कि मेरा रूप बड़ा सुन्दर है, मुझे छोड़ कन्या भूलकर भी दूसरेको न वरेगी॥३॥

**चौ०** 
> मुनि हित कारन कृपानिधाना। दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना॥  
> सो चरित्र लखि काहुँ न पावा। नारद जानि सबहिं सिर नावा॥४॥

भावार्थ: कृपानिधान भगवान्‌ने मुनिके कल्याणके लिये उन्हें ऐसा कुरूप बना दिया कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता; पर यह चरित कोई भी न जान सका। सबने उन्हें नारद ही जानकर प्रणाम किया॥४॥

**दो०** 
> रहे तहाँ दुइ रुद्र गन ते जानहिं सब भेउ।  
> बिप्रबेष देखत फिरहिं परम कौतुकी तेउ॥१३३॥

भावार्थ: वहाँ दो शिवजीके गण भी थे। वे सब भेद जानते थे और ब्राह्मणका वेष बनाकर सारी लीला देखते-फिरते थे। वे भी बड़े मौजी थे॥१३३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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