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title: "बालकाण्ड दोहा 132"
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# बालकाण्ड · दोहा 132

विश्वमोहिनीका स्वयंवर, शिवगणोंको तथा भगवान्‌को शाप और नारदका मोह-भंग

**चौ०** 
> हरि सन मागौं सुंदरताई। होइहि जात गहरु अति भाई॥  
> मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहि अवसर सहाय सोइ होऊ॥ १ ॥

भावार्थ: [एक काम करूँ कि] भगवान्‌से सुन्दरता माँगूँ; पर भाई! उनके पास जानेमें तो बहुत देर हो जायगी। किन्तु श्रीहरिके समान मेरा हितू भी कोई नहीं है, इसलिये इस समय वे ही मेरे सहायक हों॥१॥

**चौ०** 
> बहुबिधि बिनय कीन्हि तेहि काला। प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला॥  
> प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुड़ाने। होइहि काजु हिएँ हरषाने॥ २ ॥

भावार्थ: उस समय नारदजीने भगवान्‌की बहुत प्रकारसे विनती की। तब लीलामय कृपालु प्रभु [वहीं] प्रकट हो गये। स्वामीको देखकर नारदजीके नेत्र शीतल हो गये और वे मनमें बड़े ही हर्षित हुए कि अब तो काम बन ही जायगा॥२॥

**चौ०** 
> अति आरति कहि कथा सुनाई। करहु कृपा करि होहु सहाई॥  
> आपन रूप देहु प्रभु मोही। आन भाँति नहिं पावौं ओही॥३॥

भावार्थ: नारदजीने बहुत आर्त (दीन) होकर सब कथा कह सुनायी [और प्रार्थना की कि] कृपा कीजिये और कृपा करके मेरे सहायक बनिये। हे प्रभो! आप अपना रूप मुझको दीजिये और किसी प्रकार मैं उस (राजकन्या) को नहीं पा सकता॥३॥

**चौ०** 
> जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं तोरा॥  
> निज माया बल देखि बिसाला। हियँ हँसि बोले दीनदयाला॥४॥

भावार्थ: हे नाथ! जिस तरह मेरा हित हो, आप वही शीघ्र कीजिये। मैं आपका दास हूँ। अपनी मायाका विशाल बल देख दीनदयालु भगवान्‌ मन-ही-मन हँसकर बोले— ॥४॥

**दो०** 
> जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार।  
> सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार॥१३२॥

भावार्थ: हे नारदजी! सुनो, जिस प्रकार आपका परम हित होगा, हम वही करेंगे, दूसरा कुछ नहीं। हमारा वचन असत्य नहीं होता॥१३२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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