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title: "बालकाण्ड दोहा 131"
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# बालकाण्ड · दोहा 131

**चौ०** 
> देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगि रहे निहारी॥  
> लच्छन तासु बिलोकि भुलाने। हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने॥१॥

भावार्थ: उसके रूपको देखकर मुनि वैराग्य भूल गये और बड़ी देरतक उसकी ओर देखते ही रह गये। उसके लक्षण देखकर मुनि अपने-आपको भी भूल गये और हृदयमें हर्षित हुए, पर प्रकटरूपमें उन लक्षणोंको नहीं कहा॥१॥

**चौ०** 
> जो एहि बरइ अमर सोइ होई। समरभूमि तेहि जीत न कोई॥  
> सेवहिं सकल चराचर ताही। बरइ सीलनिधि कन्या जाही॥२॥

भावार्थ: [लक्षणोंको सोचकर वे मनमें कहने लगे कि] जो इसे ब्याहेगा, वह अमर हो जायगा और रणभूमिमें कोई उसे जीत न सकेगा। यह शीलनिधिकी कन्या जिसको वरेगी, सब चर-अचर जीव उसकी सेवा करेंगे॥२॥

**चौ०** 
> लच्छन सब बिचारि उर राखे। कछुक बनाइ भूप सन भाषे॥  
> सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीं। नारद चले सोच मन माहीं॥३॥

भावार्थ: सब लक्षणोंको विचारकर मुनिने अपने हृदयमें रख लिया और राजासे कुछ अपनी ओरसे बनाकर कह दिया। राजासे लड़कीके सुलक्षण कहकर नारदजी चल दिये। पर उनके मनमें यह चिन्ता थी कि— ॥३॥

**चौ०** 
> करौं जाइ सोइ जतन बिचारी। जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी॥  
> जप तप कछु न होइ तेहि काला। हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला॥४॥

भावार्थ: मैं जाकर सोच-विचारकर अब वही उपाय करूँ, जिससे यह कन्या मुझे ही वरे। इस समय जप-तपसे तो कुछ हो नहीं सकता। हे विधाता! मुझे यह कन्या किस तरह मिलेगी?॥४॥

**दो०** 
> एहि अवसर चाहिअ परम सोभा रूप बिसाल।  
> जो बिलोकि रीझै कुअँरि तब मेलै जयमाल॥१३१॥

भावार्थ: इस समय तो बड़ी भारी शोभा और विशाल (सुन्दर) रूप चाहिये, जिसे देखकर राजकुमारी मुझपर रीझ जाय और तब जयमाल [मेरे गलेमें] डाल दे॥१३१॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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