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title: "बालकाण्ड दोहा 130"
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# बालकाण्ड · दोहा 130

**चौ०** 
> बसहिं नगर सुंदर नर नारी। जनु बहु मनसिज रति तनुधारी॥  
> तेहिं पुर बसइ सीलनिधि राजा। अगनित हय गय सेन समाजा॥१॥

भावार्थ: उस नगरमें ऐसे सुन्दर नर-नारी बसते थे मानो बहुत-से कामदेव और [उसकी स्त्री] रति ही मनुष्य-शरीर धारण किये हुए हों। उस नगरमें शीलनिधि नामका राजा रहता था, जिसके यहाँ असंख्य घोड़े, हाथी और सेनाके समूह (टुकड़ियाँ) थे॥१॥

**चौ०** 
> सत सुरेस सम बिभव बिलासा। रूप तेज बल नीति निवासा॥  
> बिस्वमोहनी तासु कुमारी। श्री बिमोह जिसु रूपु निहारी॥२॥

भावार्थ: उसका वैभव और विलास सौ इन्द्रोंके समान था। वह रूप, तेज, बल और नीतिका घर था। उसके विश्वमोहिनी नामकी एक [ऐसी रूपवती] कन्या थी, जिसके रूपको देखकर लक्ष्मीजी भी मोहित हो जायँ॥२॥

**चौ०** 
> सोइ हरिमाया सब गुन खानी। सोभा तासु कि जाइ बखानी॥  
> करइ स्वयंबर सो नृपबाला। आए तहँ अगनित महिपाला॥ ३ ॥

भावार्थ: वह सब गुणोंकी खान भगवान्‌की माया ही थी। उसकी शोभाका वर्णन कैसे किया जा सकता है। वह राजकुमारी स्वयंवर करना चाहती थी, इससे वहाँ अगणित राजा आये हुए थे॥३॥

**चौ०** 
> मुनि कौतुकी नगर तेहिं गयऊ। पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ॥  
> सुनि सब चरित भूपगृहँ आए। करि पूजा नृप मुनि बैठाए॥४॥

भावार्थ: खिलवाड़ी मुनि नारदजी उस नगरमें गये और नगरवासियोंसे उन्होंने सब हाल पूछा। सब समाचार सुनकर वे राजाके महलमें आये। राजाने पूजा करके मुनिको [आसनपर] बैठाया॥४॥

**दो०** 
> आनि देखाई नारदहि भूपति राजकुमारि।  
> कहहु नाथ गुन दोष सब एहि के हृदयँ बिचारि॥१३०॥

भावार्थ: [फिर] राजाने राजकुमारीको लाकर नारदजीको दिखलाया [और पूछा कि—] हे नाथ! आप अपने हृदयमें विचारकर इसके सब गुण-दोष कहिये॥१३०॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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