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title: "बालकाण्ड दोहा 129"
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# बालकाण्ड · दोहा 129

**चौ०** 
> सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें। ग्यान बिराग हृदय नहिं जाकें॥  
> ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा। तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा॥१॥

भावार्थ: हे मुनि! सुनिये, मोह तो उसके मनमें होता है जिसके हृदयमें ज्ञान-वैराग्य नहीं है। आप तो ब्रह्मचर्यव्रतमें तत्पर और बड़े धीरबुद्धि हैं। भला, कहीं आपको भी कामदेव सता सकता है?॥१॥

**चौ०** 
> नारद कहेउ सहित अभिमाना। कृपा तुम्हारि सकल भगवाना॥  
> करुनानिधि मन दीख बिचारी। उर अंकुरेउ गरब तरु भारी॥२॥

भावार्थ: नारदजीने अभिमानके साथ कहा—भगवन्‌! यह सब आपकी कृपा है। करुणानिधान भगवान्‌ने मनमें विचारकर देखा कि इनके मनमें गर्वके भारी वृक्षका अंकुर पैदा हो गया है॥२॥

**चौ०** 
> बेगि सो मैं डारिहउँ उखारी। पन हमार सेवक हितकारी॥  
> मुनि कर हित मम कौतुक होई। अवसि उपाय करबि मैं सोई॥३॥

भावार्थ: मैं उसे तुरंत ही उखाड़ फेंकूँगा, क्योंकि सेवकोंका हित करना हमारा प्रण है। मैं अवश्य ही वह उपाय करूँगा जिससे मुनिका कल्याण और मेरा खेल हो॥३॥

**चौ०** 
> तब नारद हरि पद सिर नाई। चले हृदयँ अहमिति अधिकाई॥  
> श्रीपति निज माया तब प्रेरी। सुनहु कठिन करनी तेहि केरी॥४॥

भावार्थ: तब नारदजी भगवान्‌के चरणोंमें सिर नवाकर चले। उनके हृदयमें अभिमान और भी बढ़ गया। तब लक्ष्मीपति भगवान्‌ने अपनी मायाको प्रेरित किया। अब उसकी कठिन करनी सुनो॥४॥

**दो०** 
> बिरचेउ मग महुँ नगर तेहिं सत जोजन बिस्तार।  
> श्रीनिवासपुर तें अधिक रचना बिबिध प्रकार॥१२९॥

भावार्थ: उस (हरिमाया) ने रास्तेमें सौ योजन (चार सौ कोस) का एक नगर रचा। उस नगरकी भाँति-भाँतिकी रचनाएँ लक्ष्मीनिवास भगवान्‌ विष्णुके नगर (वैकुण्ठ) से भी अधिक सुन्दर थीं॥१२९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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