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title: "बालकाण्ड दोहा 127"
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# बालकाण्ड · दोहा 127

**चौ०** 
> भयउ न नारद मन कछु रोषा। कहि प्रिय बचन काम परितोषा॥  
> नाइ चरन सिरु आयसु पाई। गयउ मदन तब सहित सहाई॥ १ ॥

भावार्थ: नारदजीके मनमें कुछ भी क्रोध न आया। उन्होंने प्रिय वचन कहकर कामदेवका समाधान किया। तब मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर और उनकी आज्ञा पाकर कामदेव अपने सहायकोंसहित लौट गया॥ १ ॥

**चौ०** 
> मुनि सुसीलता आपनि करनी। सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी॥  
> सुनि सब कें मन अचरजु आवा। मुनिहि प्रसंसि हरिहि सिरु नावा॥२॥

भावार्थ: देवराज इन्द्रकी सभामें जाकर उसने मुनिकी सुशीलता और अपनी करतूत सब कही, जिसे सुनकर सबके मनमें आश्चर्य हुआ और उन्होंने मुनिकी बड़ाई करके श्रीहरिको सिर नवाया॥ २ ॥

**चौ०** 
> तब नारद गवने सिव पाहीं। जिता काम अहमिति मन माहीं॥  
> मार चरित संकरहि सुनाए। अतिप्रिय जानि महेस सिखाए॥३॥

भावार्थ: तब नारदजी शिवजीके पास गये। उनके मनमें इस बातका अहंकार हो गया कि हमने कामदेवको जीत लिया। उन्होंने कामदेवके चरित्र शिवजीको सुनाये और महादेवजीने उन ( नारदजी ) को अत्यन्त प्रिय जानकर [ इस प्रकार ] शिक्षा दी— ॥ ३ ॥

**चौ०** 
> बार बार बिनवउँ मुनि तोही। जिमि यह कथा सुनायहु मोही॥  
> तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ। चलेहुँ प्रसंग दुराएहु तबहूँ॥४॥

भावार्थ: हे मुनि! मैं तुमसे बार-बार विनती करता हूँ कि जिस तरह यह कथा तुमने मुझे सुनायी है, उस तरह भगवान्‌ श्रीहरिको कभी मत सुनाना। चर्चा भी चले तब भी इसको छिपा जाना॥४॥

**दो०** 
> संभु दीन्ह उपदेस हित नहिं नारदहि सोहान।  
> भरद्वाज कौतुक सुनहु हरि इच्छा बलवान॥१२७॥

भावार्थ: यद्यपि शिवजीने यह हितकी शिक्षा दी, पर नारदजीको वह अच्छी न लगी। हे भरद्वाज! अब कौतुक (तमाशा) सुनो। हरिकी इच्छा बड़ी बलवान्‌ है॥१२७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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