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title: "बालकाण्ड दोहा 124b"
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# बालकाण्ड · दोहा 124b

**चौ०** 
> तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना। कौतुकनिधि कृपाल भगवाना॥  
> तहाँ जलंधर रावन भयऊ। रन हति राम परम पद दयऊ॥१॥

भावार्थ: लीलाओंके भण्डार कृपालु हरिने उस स्त्रीके शापको प्रामाण्य दिया ( स्वीकार किया )। वही जलन्धर उस कल्पमें रावण हुआ, जिसे श्रीरामचन्द्रजीने युद्धमें मारकर परमपद दिया॥ १ ॥

**चौ०** 
> एक जनम कर कारन एहा। जेहि लगि राम धरी नरदेहा॥  
> प्रति अवतार कथा प्रभु केरी। सुनु मुनि बरनी कबिन्ह घनेरी॥२॥

भावार्थ: एक जन्मका कारण यह था, जिससे श्रीरामचन्द्रजीने मनुष्यदेह धारण किया। हे भरद्वाज मुनि! सुनो, प्रभुके प्रत्येक अवतारकी कथाका कवियोंने नाना प्रकारसे वर्णन किया है॥ २ ॥

**चौ०** 
> नारद श्राप दीन्ह एक बारा। कलप एक तेहि लगि अवतारा॥  
> गिरिजा चकित भईं सुनि बानी। नारद बिष्नुभगत पुनि ग्यानी॥३॥

भावार्थ: एक बार नारदजीने शाप दिया, अतः एक कल्पमें उसके लिये अवतार हुआ। यह बात सुनकर पार्वतीजी बड़ी चकित हुईं [ और बोलीं कि ] नारदजी तो विष्णुभक्त और ज्ञानी हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> कारन कवन श्राप मुनि दीन्हा। का अपराध रमापति कीन्हा॥  
> यह प्रसंग मोहि कहहु पुरारी। मुनि मन मोह आचरज भारी॥४॥

भावार्थ: मुनिने भगवान्‌को शाप किस कारणसे दिया? लक्ष्मीपति भगवान्‌ने उनका क्या अपराध किया था? हे पुरारि ( शङ्करजी )! यह कथा मुझसे कहिये। मुनि नारदके मनमें मोह होना बड़े आश्चर्यकी बात है॥ ४ ॥

**दो०** 
> बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ।  
> जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ॥१२४ (क)॥

भावार्थ: तब महादेवजीने हँसकर कहा—न कोई ज्ञानी है न मूर्ख। श्रीरघुनाथजी जब जिसको जैसा करते हैं, वह उसी क्षण वैसा ही हो जाता है॥ १२४ (क) ॥

**सो०** 
> कहउँ राम गुन गाथ भरद्वाज सादर सुनहु।  
> भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद॥१२४ (ख)॥

भावार्थ: [ याज्ञवल्क्यजी कहते हैं— ] हे भरद्वाज! मैं श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंकी कथा कहता हूँ, तुम आदरसे सुनो। तुलसीदासजी कहते हैं—मान और मदको छोड़कर आवागमनका नाश करनेवाले रघुनाथजीको भजो॥ १२४ (ख) ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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