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title: "बालकाण्ड दोहा 123"
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# बालकाण्ड · दोहा 123

**चौ०** 
> मुकुत न भए हते भगवाना। तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना॥  
> एक बार तिन्ह के हित लागी। धरेउ सरीर भगत अनुरागी॥१॥

भावार्थ: भगवान्‌के द्वारा मारे जानेपर भी वे ( हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु ) इसीलिये मुक्त नहीं हुए कि ब्राह्मणके वचन ( शाप ) का प्रमाण तीन जन्मके लिये था। अतः एक बार उनके कल्याणके लिये भक्तप्रेमी भगवान्‌ने फिर अवतार लिया॥ १ ॥

**चौ०** 
> कस्यप अदिति तहाँ पितु माता। दसरथ कौसल्या बिख्याता॥  
> एक कलप एहि बिधि अवतारा। चरित पवित्र किए संसारा॥२॥

भावार्थ: वहाँ ( उस अवतारमें ) कश्यप और अदिति उनके माता-पिता हुए, जो दशरथ और कौसल्याके नामसे प्रसिद्ध थे। एक कल्पमें इस प्रकार अवतार लेकर उन्होंने संसारमें पवित्र लीलाएँ कीं॥ २ ॥

**चौ०** 
> एक कलप सुर देखि दुखारे। समर जलंधर सन सब हारे॥  
> संभु कीन्ह संग्राम अपारा। दनुज महाबल मरइ न मारा॥३॥

भावार्थ: एक कल्पमें सब देवताओंको जलन्धर दैत्यसे युद्धमें हार जानेके कारण दुःखी देखकर शिवजीने उसके साथ बड़ा घोर युद्ध किया; पर वह महाबली दैत्य मारे नहीं मरता था॥ ३ ॥

**चौ०** 
> परम सती असुराधिप नारी। तेहिं बल ताहि न जितहिं पुरारी॥४॥

भावार्थ: उस दैत्यराजकी स्त्री परम सती ( बड़ी ही पतिव्रता ) थी। उसीके प्रतापसे त्रिपुरासुर [ जैसे अजेय शत्रु ] का विनाश करनेवाले शिवजी भी उस दैत्यको नहीं जीत सके॥ ४ ॥

**दो०** 
> छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह।  
> जब तेहिं जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह॥१२३॥

भावार्थ: प्रभुने छलसे उस स्त्रीका व्रत भङ्ग कर देवताओंका काम किया। जब उस स्त्रीने यह भेद जाना, तब उसने क्रोध करके भगवान्‌को शाप दिया॥ १२३ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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