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title: "बालकाण्ड दोहा 12"
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# बालकाण्ड · दोहा 12

**चौ०** 
> जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला॥  
> चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े। कपट कलेवर कलि मल भाँड़े॥१॥

भावार्थ: जो कराल कलियुगमें जन्मे हैं, जिनकी करनी कौएके समान है और वेष हंसका-सा है, जो वेदमार्गको छोड़कर कुमार्गपर चलते हैं, जो कपटकी मूर्ति और कलियुगके पापोंके भाँड़े हैं॥१॥

**चौ०** 
> बंचक भगत कहाइ राम के। किंकर कंचन कोह काम के॥  
> तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी। धींग धरमध्वज धंधक धोरी॥२॥

भावार्थ: जो श्रीरामजीके भक्त कहलाकर लोगोंको ठगते हैं, जो धन ( लोभ ), क्रोध और कामके गुलाम हैं और जो धींगाधींगी करनेवाले, धर्मध्वजी ( धर्मकी झूठी ध्वजा फहरानेवाले—दम्भी ) और कपटके धन्धोंका बोझ ढोनेवाले हैं, संसारके ऐसे लोगोंमें सबसे पहले मेरी गिनती है॥२॥

**चौ०** 
> जौं अपने अवगुन सब कहऊँ। बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ॥  
> ताते मैं अति अलप बखाने। थोरे महुँ जानिहहिं सयाने॥ ३॥

भावार्थ: यदि मैं अपने सब अवगुणोंको कहने लगूँ तो कथा बहुत बढ़ जायगी और मैं पार नहीं पाऊँगा। इससे मैंने बहुत कम अवगुणोंका वर्णन किया है। बुद्धिमान्‌ लोग थोड़ेहीमें समझ लेंगे॥३॥

**चौ०** 
> समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी। कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी॥  
> एतेहु पर करिहहिं जे असंका। मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका॥४॥

भावार्थ: मेरी अनेकों प्रकारकी विनतीको समझकर, कोई भी इस कथाको सुनकर दोष नहीं देगा। इतनेपर भी जो शंका करेंगे, वे तो मुझसे भी अधिक मूर्ख और बुद्धिके कंगाल हैं॥४॥

**चौ०** 
> कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ॥  
> कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा॥ ५॥

भावार्थ: मैं न तो कवि हूँ, न चतुर कहलाता हूँ; अपनी बुद्धिके अनुसार श्रीरामजीके गुण गाता हूँ। कहाँ तो श्रीरघुनाथजीके अपार चरित्र, कहाँ संसारमें आसक्त मेरी बुद्धि!॥५॥

**चौ०** 
> जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं। कहहु तूल केहि लेखे माहीं॥  
> समुझत अमित राम प्रभुताई। करत कथा मन अति कदराई॥६॥

भावार्थ: जिस हवासे सुमेरु-जैसे पहाड़ उड़ जाते हैं, कहिये तो, उसके सामने रूई किस गिनतीमें है। श्रीरामजीकी असीम प्रभुताको समझकर कथा रचनेमें मेरा मन बहुत हिचकता है— ॥६॥

**दो०** 
> सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान।  
> नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान॥१२॥

भावार्थ: सरस्वतीजी, शेषजी, शिवजी, ब्रह्माजी, शास्त्र, वेद और पुराण—ये सब ‘नेति-नेति’ कहकर ( पार नहीं पाकर ‘ऐसा नहीं’, ‘ऐसा नहीं’ कहते हुए ) सदा जिनका गुणगान किया करते हैं॥१२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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