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title: "बालकाण्ड दोहा 119"
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# बालकाण्ड · दोहा 119

**चौ०** 
> कासीं मरत जंतु अवलोकी। जासु नाम बल करउँ बिसोकी॥  
> सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी। रघुबर सब उर अंतरजामी॥१॥

भावार्थ: [ हे पार्वती! ] जिनके नामके बलसे काशीमें मरते हुए प्राणीको देखकर मैं उसे [ राममन्त्र देकर ] शोकरहित कर देता हूँ ( मुक्त कर देता हूँ ), वही मेरे प्रभु रघुश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी जड़-चेतनके स्वामी और सबके हृदयके भीतरकी जाननेवाले हैं॥१॥

**चौ०** 
> बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं। जनम अनेक रचित अघ दहहीं॥  
> सादर सुमिरन जे नर करहीं। भव बारिधि गोपद इव तरहीं॥२॥

भावार्थ: विवश होकर ( बिना इच्छाके ) भी जिनका नाम लेनेसे मनुष्योंके अनेक जन्मोंमें किये हुए पाप जल जाते हैं। फिर जो मनुष्य आदरपूर्वक उनका स्मरण करते हैं, वे तो संसाररूपी [ दुस्तर ] समुद्रको गायके खुरसे बने हुए गड्‌ढेके समान ( अर्थात्‌ बिना किसी परिश्रमके ) पार कर जाते हैं॥२॥

**चौ०** 
> राम सो परमातमा भवानी। तहँ भ्रम अति अबिहित तव बानी॥  
> अस संसय आनत उर माहीं। ग्यान बिराग सकल गुन जाहीं॥३॥

भावार्थ: हे पार्वती! वही परमात्मा श्रीरामचन्द्रजी हैं। उनमें भ्रम [ देखनेमें आता ] है, तुम्हारा ऐसा कहना अत्यन्त ही अनुचित है। इस प्रकारका सन्देह मनमें लाते ही मनुष्यके ज्ञान, वैराग्य आदि सारे सद्‌गुण नष्ट हो जाते हैं॥३॥

**चौ०** 
> सुनि सिव के भ्रम भंजन बचना। मिटि गै सब कुतरक कै रचना॥  
> भइ रघुपति पद प्रीति प्रतीती। दारुन असंभावना बीती॥४॥

भावार्थ: शिवजीके भ्रमनाशक वचनोंको सुनकर पार्वतीजीके सब कुतर्कोंकी रचना मिट गयी। श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें उनका प्रेम और विश्वास हो गया और कठिन असम्भावना ( जिसका होना सम्भव नहीं, ऐसी मिथ्या कल्पना ) जाती रही॥४॥

**दो०** 
> पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि जोरि पंकरुह पानि।  
> बोलीं गिरिजा बचन बर मनहुँ प्रेम रस सानि॥११९॥

भावार्थ: बार-बार स्वामी ( शिवजी ) के चरणकमलोंको पकड़कर और अपने कमलके समान हाथोंको जोड़कर पार्वतीजी मानो प्रेमरसमें सानकर सुन्दर वचन बोलीं॥११९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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