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title: "बालकाण्ड दोहा 118"
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# बालकाण्ड · दोहा 118

**चौ०** 
> एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई। जदपि असत्य देत दुख अहई॥  
> जौं सपनें सिर काटै कोई। बिनु जागें न दूरि दुख होई॥१॥

भावार्थ: इसी तरह यह संसार भगवान्‌के आश्रित रहता है। यद्यपि यह असत्य है, तो भी दुःख तो देता ही है; जिस तरह स्वप्नमें कोई सिर काट ले तो बिना जागे वह दुःख दूर नहीं होता॥१॥

**चौ०** 
> जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई। गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई॥  
> आदि अंत कोउ जासु न पावा। मति अनुमानि निगम अस गावा॥२॥

भावार्थ: हे पार्वती! जिनकी कृपासे इस प्रकारका भ्रम मिट जाता है, वही कृपालु श्रीरघुनाथजी हैं। जिनका आदि और अन्त किसीने नहीं [ जान ] पाया। वेदोंने अपनी बुद्धिसे अनुमान करके इस प्रकार ( नीचे लिखे अनुसार ) गाया है—॥२॥

**चौ०** 
> बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥  
> आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥३॥

भावार्थ: वह ( ब्रह्म ) बिना ही पैरके चलता है, बिना ही कानके सुनता है, बिना ही हाथके नाना प्रकारके काम करता है, बिना मुँह ( जिह्वा ) के ही सारे ( छहों ) रसोंका आनन्द लेता है और बिना ही वाणीके बहुत योग्य वक्ता है॥३॥

**चौ०** 
> तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा॥  
> असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिं बरनी॥४॥

भावार्थ: वह बिना ही शरीर ( त्वचा ) के स्पर्श करता है, बिना ही आँखोंके देखता है और बिना ही नाकके सब गन्धोंको ग्रहण करता है ( सूँघता है )। उस ब्रह्मकी करनी सभी प्रकारसे ऐसी अलौकिक है कि जिसकी महिमा कही नहीं जा सकती॥४॥

**दो०** 
> जेहि इमि गावहिं बेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान।  
> सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान॥११८॥

भावार्थ: जिसका वेद और पण्डित इस प्रकार वर्णन करते हैं और मुनि जिसका ध्यान धरते हैं, वही दशरथनन्दन, भक्तोंके हितकारी, अयोध्याके स्वामी भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजी हैं॥११८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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